सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८४ सूरसागर सार सटीक सनकादि—देखो सनक । सिंधु-सुता—लक्ष्मी जो समुद्रमंथन के समय निकले हुए १४ रत्नो मे से एक थी । सुक (शुक, शुकदेव)—व्यास के पुत्र, महान् पौराणिक कथाकार, जिन्होने परीक्षित को 'भागवत' की कथा सुनाई थी । जिस समय शिव जी एकांत मे उमा को विष्णुसहस्रनाम सुना रहे थे, एक शुक भी उसे सुन रहा था । शिव जी ने जब यह जाना तो वे शुक को मारने दौडे । शुक आत्म-रक्षार्थ व्यास पत्नी के मुंह मे चला गया और १२ वर्ष तक उनके गर्भ मे रहा । इस बीच वेदव्यास ने भागवतादि की समस्त कथाएँ अपनी पत्नी को सुनाई । शुक भी सुनता रहा । भगवान् ने इसे गर्भ मे ही तत्वज्ञानी और मायारहित होने का वरदान दिया था । जो कथा व्यास ने शुकदेव को सुनाई, वही शुकदेव से परीक्षित ने सुनी । सुदामा—गुरु सांदीपिनि के यहां श्रीकृष्ण के सहपाठी, उनके एक प्रसिद्ध बालसखा, जो एक अत्यन्त दरिद्र ब्राह्मण थे । पत्नी के बार-बार कहने पर वे अपनी दारुण दरिद्रता दूर करने की आशा मे श्रीकृष्ण के यहाँ द्वारकापुरी मे गए । मित्र को भेट देने के लिए वे केवल थोड़े से चावल ले जा सके थे, परन्तु वे उसे छिपा रहे थे । श्री.कृष्ण ने चावलों की पोटली उनसे आग्रहपूर्वक छीन ली और उसमे से दो मुट्ठी चावल फांक लिए । तीसरी मुट्ठी भरते समय रुक्मिणी जी ने उन्हे रोक दिया । सुदामा जब लौटे तो सोचने लगे कि किसी भलाई के लिए ही श्रीकृष्ण ने मुझे यथेष्ट धन नही दिया । परन्तु जब घर पहुँचे तो वे चकित हो गए । उनके यहां अपार वैभव हो गया था । दो मुट्ठी चावल फांककर ही भगवान् ने उन्हे लोक-परलोक की सम्पत्ति दे डाली । द्र० भा०, स्कं० १० उ०, अ० ८०, ८१; सू०, प० ४८४२-४८६३ । सुफलकसुत—अक्रूर । देखो अक्रूर । हरिश्चन्द्र—सूर्यवंश के एक प्रसिद्ध सत्यप्रतिज्ञ राजा, जिनसे राजसूय-यज्ञ की दक्षिणा के बहाने विश्वामित्र ने सर्वस्व हर लिया था । उनकी दृढ़ प्रतिज्ञा की सबसे कठोर परीक्षा तब हुई जब वे एक चाडाल के क्रीतदास के रूप मे श्मशान पर पहरा दे रहे थे । उसी समय उनकी पत्नी शैव्या, जो एक ब्राह्मण को बेच दी गई थी, अपने मृत पुत्र रोहिताश्व का अन्तिम संस्कार करने आई । हरि- श्चन्द्र के श्मशान-कर मांगने पर जब शैव्या ने अपनी असमर्थता प्रकट की, तो इन्होने उस कर के बदले मे अपनी आधी साड़ी फाड़कर देने के लिए विवश किया । इसी समय भगवान् प्रकट हो गए ।