भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पदानुक्रमणी अंक पृष्ठ-संख्या के द्योतक हैं। अँखियन तब तैं बेर घरची । १४५ अब यह बरषो बीति गई । २५३ अँखियां हरि कैं हाथ बिकानीं । १४५ अब या तनहिं राखि कह कीजे । २५५ अँखियां हरि दरसन की प्यासी । २८५ अब ये झूठहु बोलत लोग । ६८ अंतरजामी कुँवर कन्हाई । २६० (अलि हों) कैसें कहाँ हरि के अंतर तैं हरि प्रगट भए । ११७ रूप रसहिं । २८२ अचंभो इन लोगनि की आवै । ४२ अब वै वातैं उलटि गई । २३६ अति कोमल तनु घरच्यो कन्हाई । ८१ अब हरि आइहैं जनि सोचै । ३५७ अति मलीन वृषभानु-कुमारी । ३२४ अबहीं तैं हम सबनि बिसारी । ८७ अद्भुत एक अनूपम बाग । १८६ अविगत-गति कछु कहत न आवै । १७ अधर-रस मुरली लूटन लागी । ८६ आंखिनि मैं वसी, जिय मैं बसे, १७१ अनत सुत गोरस कौं कत जात ? ७२ आए जोग सिखावन पांडे । २८७ अपने सगुन गोपालहिं माई, ३०७ आछी गात अकार गारची । २६ अपने स्वारथ के सब कोऊ । ३१४ आजु अति कोपे हैं रन राम । ३७० अपनौ गाउँ लेउ नंदरानी । ७१ आजु कन्हैया बहुत बच्यौ री । ८३ अपुनपौ आपुन ही बिसरयौ । ४४ आजु कोउ नीकी बात सुनावै । २७० अपुनपौ आपुन ही मैं पायौ । ४५ आजु घनस्याम की अनुहारि । २५१ अब अति चकितवंत मन मेरौ । ३२५ आजु जसोदा जाइ कन्हैया, ८२ अब कैं राखि लेहु गोपाल । ८३ आजु नंद के द्वारैं भीर । ४६ अब कैं राखि लेहु भगवान । २६ आजु मैं गाइ चरावन जैहौं । ८० अब घर काहूँ कें जनि जाहु । ७७ आजु रैनि नहिं नींद परी । २१५ अब जुवतिनि सौं प्रगटे स्याम । १८७ आजु सखी अरुनोदय मेरे, १८१ अब तौ प्रगट भई जग जानी । १३४ आजु हरि अद्भुत रास उपायौ । ११८ अब नंद गाइ लेहु संभारि । २१४ आजु हौं एक-एक करि टरिहौं । २७ अब बरषा कौ आगम आयौ । २४६ आनंदै आनंद बढ़यो अति । ५७ अब मैं जानी, देह बुढानी । ३६ आपु गए हारूएँ सूनैं घर । ६७ अब मैं तोसौं कहा दुराऊँ । १८४ आपुन भईं सबै अब चोरी । १२४ अब मैं नाच्यो बहुत गुपाल । २८ आयौ घोष बड़ो व्योपारी । ३१४ २१