सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
पृष्ठ 346, कुल 359 में से
संदर्भ में पढ़ें३८६ सूरसागर सार सटीक आवत उरग नाथे स्याम । ६३ ऊधौ कही सांची बात । २७४ आवत मोहन धेनु चराए । १३८ ऊधौ कहौ हरि कुसलात । २७५ आवहु री मिलि मंगल गावहु । ३४१ ऊधौ काहे कौं भक्त कहावत । ३०४ इक दिन नंद चलाई बात । २३३ ऊधौ कोउ नाहींन अधिकारी । ३०८ इत-उत देखत जनम गयौ । ३४ ऊधौ कोकिल कूकत कानन । ३१३ इततैं राधा जाति जमुन-तट, १७२ ऊधौ क्यौं बिसरत वह नेह । ३१७ इतनी बात अलि कहियो हरि सौं, ३२१ ऊधौ जब ब्रज पहुँचे जाइ । ३२७ इन अखियन आगैं तैं मोहन, ६८ ऊधौ जात ब्रजहिं सुने । २६६ इनकौं ब्रजहीँ क्यौं न बुलावहु । १८१ ऊधौ जू, कहियो तुम हरि सौं, ३२१ इन नैननि मोहिं बहुत सतायौ । १४२ ऊधौ जोग कहा है कीजतु । ३१४ इहिँ अंतर मधुकर इक आयौ । २७८ ऊधौ जोग जोग हम नाहीं । ३११ इहिँ उर माखन चोर गडे । २८८ ऊधौ जोग बिसरि जनि जाहु । ३०४ इहिँ डर बहुरि न गोकुल आए । ३१८ ऊधौ जो हरि हितू तुम्हारे । ३०६ इहिँ दुख तन तरफत मरि जैहैं । २५७ ऊधौ तिहारे पा लागति हौं, ३२५ इहिँ विधि पावस सदा हमारैं । ३१२ ऊधौ तुम ब्रज की दसा बिचारी । २८१ इहिँ विधि वेद-मारग सुनो । १११ ऊधौ तुम यह निश्चय जानौ । २६३ उग्रसेन कौं दियौ हरि राज । २२३ ऊधौ तुम हौ निकट के बासी । २८४ उठे कहि माधौ इतनी बात । २२७ (ऊधौ) ना हम विरहिनि ना तुम उत नंदहिं सपनौ भयौ, २११ दास । ३०४ उती दूर तैं को आवै री । ३५१ ऊधौ पा लागति हौं कहियौ, ३२५ उनकौं ब्रज बसिबौ नहिं भावै । २५८ ऊधौ बानी कौन ठहरैगौ, २८० उपमा नैन न एक रही । २८६ ऊधौ भली भई ब्रज आए । ३०२ उपमा हरि तनु देख लजानी । १३८ ऊधौ भलो ज्ञान समुझायौ । ३३१ उमगीं ब्रजनारि सुभग, ५४ ऊधौ मन अभिमान बढायौ । २६३ उरग लियो हरि को लपटाइ । ६१ ऊधौ मन न भए दस बीस । २८८ उलटि पग कैसैं दीन्हौ नद । २२८ ऊधौ मन नहिं हाथ हमारैं । २८८ उलटी रीति तिहारी ऊधौ, २८४ ऊधौ मन माने की बात । ३१८ ऊधौ अँखियां अति अनुरागी । २८६ ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं । ३३६ ऊधौ इक पतिया हमरी लीजे । ३२२ ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं । ३३६ ऊधौ इतनी कहियो जाइ । २६८ ऊधौ मौन साधि रहे । ३०८ ऊधौ इतनी कहियौ जाइ । ३२४ ऊधौ ले चल लै चल । ३०५ ऊधौ इतनी कहियो बात । ३२३ ऊधौ सुधि नाहीं या तन की । ३१६ ऊधौ कहा करैं लै पाती । २७७ ऊधौ सुनहु नैकु जो बात । ३१० ऊधौ कही सु फेरि न कहिए । २८८ ऊधौ हम आजु भईं बड़ भागी । २८२