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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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३८२ , सूरसागर सार सटीक ' भृगु-पद - विष्णु भगवान् के वक्ष-स्थल पर स्थायी रूप से स्थापित भृगु-ऋषि का पद- चिन्ह । देखो भृगु । मुचकुन्द - अयोध्या का एक प्राचीन राजा, मांधाता का पुत्र, जो देवासुर संग्राम मे देवो की ओर से लड़ते-लड़ते थककर हिमालय की एक गुफा में सो गया था । कालयवन द्वारा खदेड़े जाकर श्रीकृष्ण जब उस गुफा में पहुँचे तो उन्होने अपना पीतांबर उसे ओढा दिया । पीछे से कालयवन ने आकर उसी को कृष्ण समझा और उस पर आक्रमण किया । मुचकुन्द के नेत्र खोलते ही कालयवन भस्म हो गया । देखो कालयवन । मुष्टिक - कंस का एक असुर मल्ल जिसे धनुष-यज्ञ पर आयोजित मल्लकीड़ा मे बलराम ने मारा था । दूसरे मल्ल, चाणूर को कृष्ण ने मारा था । देखो चाणूर । रंभा - एक अति रूपवती अप्सरा, चौदह रत्नो मे से एक, जो इन्द्र-सभा की शोभा बढ़ाती है । रजक - धोबी, यहाँ कंस का विशिष्ट धोबी, जिसे मथुरा में प्रवेश करते समय, कृष्ण ने धुले कपड़े ले जाते देखा और माँगने पर कपड़े देना अस्वीकार करने के कारण एक तमाचे के प्रहार से मार डाला । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० ४१; सू०, प० ३६५५-३६६० । राजसूय -- चक्रवर्ती सम्राट् द्वारा किया जाने वाला यज्ञ, जिसमे अन्य राजागण सेवक बनते है। यहाँ युधिष्ठिर द्वारा किया गया राजसूय यज्ञ जिसमे श्रीकृष्ण ने अभ्यागत जनो के पैर धोने का सेवक-कार्य स्वेच्छा से ग्रहण किया था । इसी यज्ञ मे सबसे पहले श्रीकृष्ण के पूजे जाने पर कुपित होकर शिशुपाल ने श्रीकृष्ण को गालियां दी तथा श्रीकृष्ण ने सुदर्शनचक्र से उसका वध किया । इसी यज्ञ के अवसर पर अभिमानी और ईर्ष्यालु दुर्योधन ने जब भाइयो सहित प्रवेश किया तो सूखे मे जल का तथा जल मे सूखे का भ्रम होने से वह हास्यास्पद आचरण करने लगा । जिससे पांडव, उनकी स्त्रियां आदि सभी हँसने लगे तथा दुर्योधन अत्यन्त लज्जित हुआ । द्र० भा०, स्कं० १० उ०, अ० ७५-७६; सू०, प० ४८३७-४८३८ । राहु - सिंहि का पुत्र, एक असुर । समुद्र-मथन के बाद देवताओं मे सम्मिलित होकर अमृत-पान करने के अपराध मे विष्णु ने इसका सर काट डाला था । परन्तु अमृत के प्रभाव से वह राहु (सर) तथा केतु (धड) के रूप में अमर रहा । सूर्य और चन्द्रमा ने ही पहचानकर उसकी शिकायत कर दी थी, अतः वह उनसे शत्रुता मानकर उन्हे 'ग्रहण' के रूप मे ग्रसता रहता है । रिषि-साप (ऋषि-शाप) - सोभरि ऋषि का गरुड को शाप । एक बार ब्रज मे यमुना के एक गम्भीर दह मे - जो बाद में कालियदह नाम से प्रसिद्ध हुआ - सौभरि ऋषि के रोकने पर भी गरुड ने एक भारी मच्छ खा डाला । उसके वियोग मे