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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

३८२ , सूरसागर सार सटीक ' भृगु-पद - विष्णु भगवान् के वक्ष-स्थल पर स्थायी रूप से स्थापित भृगु-ऋषि का पद- चिन्ह । देखो भृगु । मुचकुन्द - अयोध्या का एक प्राचीन राजा, मांधाता का पुत्र, जो देवासुर संग्राम मे देवो की ओर से लड़ते-लड़ते थककर हिमालय की एक गुफा में सो गया था । कालयवन द्वारा खदेड़े जाकर श्रीकृष्ण जब उस गुफा में पहुँचे तो उन्होने अपना पीतांबर उसे ओढा दिया । पीछे से कालयवन ने आकर उसी को कृष्ण समझा और उस पर आक्रमण किया । मुचकुन्द के नेत्र खोलते ही कालयवन भस्म हो गया । देखो कालयवन । मुष्टिक - कंस का एक असुर मल्ल जिसे धनुष-यज्ञ पर आयोजित मल्लकीड़ा मे बलराम ने मारा था । दूसरे मल्ल, चाणूर को कृष्ण ने मारा था । देखो चाणूर । रंभा - एक अति रूपवती अप्सरा, चौदह रत्नो मे से एक, जो इन्द्र-सभा की शोभा बढ़ाती है । रजक - धोबी, यहाँ कंस का विशिष्ट धोबी, जिसे मथुरा में प्रवेश करते समय, कृष्ण ने धुले कपड़े ले जाते देखा और माँगने पर कपड़े देना अस्वीकार करने के कारण एक तमाचे के प्रहार से मार डाला । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० ४१; सू०, प० ३६५५-३६६० । राजसूय -- चक्रवर्ती सम्राट् द्वारा किया जाने वाला यज्ञ, जिसमे अन्य राजागण सेवक बनते है। यहाँ युधिष्ठिर द्वारा किया गया राजसूय यज्ञ जिसमे श्रीकृष्ण ने अभ्यागत जनो के पैर धोने का सेवक-कार्य स्वेच्छा से ग्रहण किया था । इसी यज्ञ मे सबसे पहले श्रीकृष्ण के पूजे जाने पर कुपित होकर शिशुपाल ने श्रीकृष्ण को गालियां दी तथा श्रीकृष्ण ने सुदर्शनचक्र से उसका वध किया । इसी यज्ञ के अवसर पर अभिमानी और ईर्ष्यालु दुर्योधन ने जब भाइयो सहित प्रवेश किया तो सूखे मे जल का तथा जल मे सूखे का भ्रम होने से वह हास्यास्पद आचरण करने लगा । जिससे पांडव, उनकी स्त्रियां आदि सभी हँसने लगे तथा दुर्योधन अत्यन्त लज्जित हुआ । द्र० भा०, स्कं० १० उ०, अ० ७५-७६; सू०, प० ४८३७-४८३८ । राहु - सिंहि का पुत्र, एक असुर । समुद्र-मथन के बाद देवताओं मे सम्मिलित होकर अमृत-पान करने के अपराध मे विष्णु ने इसका सर काट डाला था । परन्तु अमृत के प्रभाव से वह राहु (सर) तथा केतु (धड) के रूप में अमर रहा । सूर्य और चन्द्रमा ने ही पहचानकर उसकी शिकायत कर दी थी, अतः वह उनसे शत्रुता मानकर उन्हे 'ग्रहण' के रूप मे ग्रसता रहता है । रिषि-साप (ऋषि-शाप) - सोभरि ऋषि का गरुड को शाप । एक बार ब्रज मे यमुना के एक गम्भीर दह मे - जो बाद में कालियदह नाम से प्रसिद्ध हुआ - सौभरि ऋषि के रोकने पर भी गरुड ने एक भारी मच्छ खा डाला । उसके वियोग मे

परिशिष्ट (ख) ३८३ तड़पती मछलियों के दुख से द्रवित होकर ऋषि ने शाप दिया कि यदि गरुड यहां किसी मछली को खाएगा तो तुरन्त उसकी मृत्यु हो जायगी । कालियनाग इस रहस्य को जानता था । अतः वह गरुड से बचने के लिए वहीं जाकर रहता था । देखो काली तथा खगराइ । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० १७ । लाक्षा-गृह (लाक्षा-गृह) - पांडवो के जलाने के लिए दुर्योधन ने लाख का एक घर बनवाया था परन्तु भगवत्कृपा से पांडव उससे जीवित निकल आए थे । श्रीदामा - श्रीकृष्ण के सबसे प्रिय और प्रधान गोप-सखा जो बाल-केलि और गोचारण की लीला मे सदैव उनके साथ रहे । 'सूरसागर' के अनुसार कालियदमन लीला का तत्काल कारण उस कंदुक-क्रीड़ा मे आ उपस्थित होता है जिसमे श्रीकृष्ण ने श्रीदामा की गेंद कालियदह मे फेक दी थी और श्रीदामा ने वापस देने का आग्रह किया था । तभी श्रीकृष्ण गें लेने के लिए कालियदह में कूद पड़े थे । ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्ण जन्म खण्ड) के अनुसार श्रीदामा के शाप के कारण ही राधा और कृष्ण को अवतार लेना पड़ा था । संकर्षण (संकर्षण) - बलराम, वसुदेव के ज्येष्ठ पुत्र, जो पहले देवकी के गर्भ में आए थे, परन्तु विष्णु की माया से देवकी का गर्भ संकर्षित होकर रोहिणी में स्थापित हो गया था ! इसलिए जब ये नन्द के यहाँ रोहिणी के गर्भ से उत्पन्न हुए, तब गर्ग ने इनका नाम संकर्षण रखा । ये चार व्यूहो - वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध - मे से एक हैं जो दुष्टो का संहार करते है । बलराम उद्धत- स्वभाव और मद्यप्रिय कहे गये हैं । हल और मूसल इनके अस्त्र है । इसी कारण ये हलधर भी कहे जाते है । सकट (शकट) - छकड़ा या गाड़ी, परन्तु यहाँ वह छकड़ा जिसे पालने मे लेटे शिशु कृष्ण ने पैर से उछालकर गिरा दिया था जिससे वह चूर-चूर हो गया था और उसमें रखे दूध-दही आदि के अनेक बर्तन टूट-फूट गए थे । इस विस्मय- जनक कार्य पर किसी को विश्वास हुआ, किसी को नही । यशोदा ने उसे ग्रहो का उत्पात समझा और स्वस्तिवाचन कराया । 'सूरसागर' मे इसे भी कस का भेजा एक असुर (शकटासुर) कहा गया है । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० ७; सू०, प० ६७६-६८० । सनक - सनक, सनंदन, सनातन, सनत्कुमार मे से एक । ये ब्रह्मा के मानस पुत्र तथा विष्णु के परम भक्त विख्यात हैं । इन लोगो के भक्ति में निरत हो जाने के कारण ब्रह्मा को अन्य पुत्रों की उत्पत्ति करनी पड़ी थी । ये विष्णु के सभासद भी कहे जाते हैं ! विष्णु के द्वारपाल जय-विजय द्वारा रोके जाने पर इन्होने ही उन्हें असुर होने तथा तीसरे जन्म मे उद्धार पाने का शाप और वरदान दिया था । इन चारों में सनत्कुमार सबसे अधिक प्रसिद्ध है । चारो को प्रायः सनकादि कहकर अभिहित किया जाता है ।

३८४ सूरसागर सार सटीक सनकादि—देखो सनक । सिंधु-सुता—लक्ष्मी जो समुद्रमंथन के समय निकले हुए १४ रत्नो मे से एक थी । सुक (शुक, शुकदेव)—व्यास के पुत्र, महान् पौराणिक कथाकार, जिन्होने परीक्षित को 'भागवत' की कथा सुनाई थी । जिस समय शिव जी एकांत मे उमा को विष्णुसहस्रनाम सुना रहे थे, एक शुक भी उसे सुन रहा था । शिव जी ने जब यह जाना तो वे शुक को मारने दौडे । शुक आत्म-रक्षार्थ व्यास पत्नी के मुंह मे चला गया और १२ वर्ष तक उनके गर्भ मे रहा । इस बीच वेदव्यास ने भागवतादि की समस्त कथाएँ अपनी पत्नी को सुनाई । शुक भी सुनता रहा । भगवान् ने इसे गर्भ मे ही तत्वज्ञानी और मायारहित होने का वरदान दिया था । जो कथा व्यास ने शुकदेव को सुनाई, वही शुकदेव से परीक्षित ने सुनी । सुदामा—गुरु सांदीपिनि के यहां श्रीकृष्ण के सहपाठी, उनके एक प्रसिद्ध बालसखा, जो एक अत्यन्त दरिद्र ब्राह्मण थे । पत्नी के बार-बार कहने पर वे अपनी दारुण दरिद्रता दूर करने की आशा मे श्रीकृष्ण के यहाँ द्वारकापुरी मे गए । मित्र को भेट देने के लिए वे केवल थोड़े से चावल ले जा सके थे, परन्तु वे उसे छिपा रहे थे । श्री.कृष्ण ने चावलों की पोटली उनसे आग्रहपूर्वक छीन ली और उसमे से दो मुट्ठी चावल फांक लिए । तीसरी मुट्ठी भरते समय रुक्मिणी जी ने उन्हे रोक दिया । सुदामा जब लौटे तो सोचने लगे कि किसी भलाई के लिए ही श्रीकृष्ण ने मुझे यथेष्ट धन नही दिया । परन्तु जब घर पहुँचे तो वे चकित हो गए । उनके यहां अपार वैभव हो गया था । दो मुट्ठी चावल फांककर ही भगवान् ने उन्हे लोक-परलोक की सम्पत्ति दे डाली । द्र० भा०, स्कं० १० उ०, अ० ८०, ८१; सू०, प० ४८४२-४८६३ । सुफलकसुत—अक्रूर । देखो अक्रूर । हरिश्चन्द्र—सूर्यवंश के एक प्रसिद्ध सत्यप्रतिज्ञ राजा, जिनसे राजसूय-यज्ञ की दक्षिणा के बहाने विश्वामित्र ने सर्वस्व हर लिया था । उनकी दृढ़ प्रतिज्ञा की सबसे कठोर परीक्षा तब हुई जब वे एक चाडाल के क्रीतदास के रूप मे श्मशान पर पहरा दे रहे थे । उसी समय उनकी पत्नी शैव्या, जो एक ब्राह्मण को बेच दी गई थी, अपने मृत पुत्र रोहिताश्व का अन्तिम संस्कार करने आई । हरि- श्चन्द्र के श्मशान-कर मांगने पर जब शैव्या ने अपनी असमर्थता प्रकट की, तो इन्होने उस कर के बदले मे अपनी आधी साड़ी फाड़कर देने के लिए विवश किया । इसी समय भगवान् प्रकट हो गए ।

पदानुक्रमणी अंक पृष्ठ-संख्या के द्योतक हैं। अँखियन तब तैं बेर घरची । १४५ अब यह बरषो बीति गई । २५३ अँखियां हरि कैं हाथ बिकानीं । १४५ अब या तनहिं राखि कह कीजे । २५५ अँखियां हरि दरसन की प्यासी । २८५ अब ये झूठहु बोलत लोग । ६८ अंतरजामी कुँवर कन्हाई । २६० (अलि हों) कैसें कहाँ हरि के अंतर तैं हरि प्रगट भए । ११७ रूप रसहिं । २८२ अचंभो इन लोगनि की आवै । ४२ अब वै वातैं उलटि गई । २३६ अति कोमल तनु घरच्यो कन्हाई । ८१ अब हरि आइहैं जनि सोचै । ३५७ अति मलीन वृषभानु-कुमारी । ३२४ अबहीं तैं हम सबनि बिसारी । ८७ अद्भुत एक अनूपम बाग । १८६ अविगत-गति कछु कहत न आवै । १७ अधर-रस मुरली लूटन लागी । ८६ आंखिनि मैं वसी, जिय मैं बसे, १७१ अनत सुत गोरस कौं कत जात ? ७२ आए जोग सिखावन पांडे । २८७ अपने सगुन गोपालहिं माई, ३०७ आछी गात अकार गारची । २६ अपने स्वारथ के सब कोऊ । ३१४ आजु अति कोपे हैं रन राम । ३७० अपनौ गाउँ लेउ नंदरानी । ७१ आजु कन्हैया बहुत बच्यौ री । ८३ अपुनपौ आपुन ही बिसरयौ । ४४ आजु कोउ नीकी बात सुनावै । २७० अपुनपौ आपुन ही मैं पायौ । ४५ आजु घनस्याम की अनुहारि । २५१ अब अति चकितवंत मन मेरौ । ३२५ आजु जसोदा जाइ कन्हैया, ८२ अब कैं राखि लेहु गोपाल । ८३ आजु नंद के द्वारैं भीर । ४६ अब कैं राखि लेहु भगवान । २६ आजु मैं गाइ चरावन जैहौं । ८० अब घर काहूँ कें जनि जाहु । ७७ आजु रैनि नहिं नींद परी । २१५ अब जुवतिनि सौं प्रगटे स्याम । १८७ आजु सखी अरुनोदय मेरे, १८१ अब तौ प्रगट भई जग जानी । १३४ आजु हरि अद्भुत रास उपायौ । ११८ अब नंद गाइ लेहु संभारि । २१४ आजु हौं एक-एक करि टरिहौं । २७ अब बरषा कौ आगम आयौ । २४६ आनंदै आनंद बढ़यो अति । ५७ अब मैं जानी, देह बुढानी । ३६ आपु गए हारूएँ सूनैं घर । ६७ अब मैं तोसौं कहा दुराऊँ । १८४ आपुन भईं सबै अब चोरी । १२४ अब मैं नाच्यो बहुत गुपाल । २८ आयौ घोष बड़ो व्योपारी । ३१४ २१

३८६ सूरसागर सार सटीक आवत उरग नाथे स्याम । ६३ ऊधौ कही सांची बात । २७४ आवत मोहन धेनु चराए । १३८ ऊधौ कहौ हरि कुसलात । २७५ आवहु री मिलि मंगल गावहु । ३४१ ऊधौ काहे कौं भक्त कहावत । ३०४ इक दिन नंद चलाई बात । २३३ ऊधौ कोउ नाहींन अधिकारी । ३०८ इत-उत देखत जनम गयौ । ३४ ऊधौ कोकिल कूकत कानन । ३१३ इततैं राधा जाति जमुन-तट, १७२ ऊधौ क्यौं बिसरत वह नेह । ३१७ इतनी बात अलि कहियो हरि सौं, ३२१ ऊधौ जब ब्रज पहुँचे जाइ । ३२७ इन अखियन आगैं तैं मोहन, ६८ ऊधौ जात ब्रजहिं सुने । २६६ इनकौं ब्रजहीँ क्यौं न बुलावहु । १८१ ऊधौ जू, कहियो तुम हरि सौं, ३२१ इन नैननि मोहिं बहुत सतायौ । १४२ ऊधौ जोग कहा है कीजतु । ३१४ इहिँ अंतर मधुकर इक आयौ । २७८ ऊधौ जोग जोग हम नाहीं । ३११ इहिँ उर माखन चोर गडे । २८८ ऊधौ जोग बिसरि जनि जाहु । ३०४ इहिँ डर बहुरि न गोकुल आए । ३१८ ऊधौ जो हरि हितू तुम्हारे । ३०६ इहिँ दुख तन तरफत मरि जैहैं । २५७ ऊधौ तिहारे पा लागति हौं, ३२५ इहिँ विधि पावस सदा हमारैं । ३१२ ऊधौ तुम ब्रज की दसा बिचारी । २८१ इहिँ विधि वेद-मारग सुनो । १११ ऊधौ तुम यह निश्चय जानौ । २६३ उग्रसेन कौं दियौ हरि राज । २२३ ऊधौ तुम हौ निकट के बासी । २८४ उठे कहि माधौ इतनी बात । २२७ (ऊधौ) ना हम विरहिनि ना तुम उत नंदहिं सपनौ भयौ, २११ दास । ३०४ उती दूर तैं को आवै री । ३५१ ऊधौ पा लागति हौं कहियौ, ३२५ उनकौं ब्रज बसिबौ नहिं भावै । २५८ ऊधौ बानी कौन ठहरैगौ, २८० उपमा नैन न एक रही । २८६ ऊधौ भली भई ब्रज आए । ३०२ उपमा हरि तनु देख लजानी । १३८ ऊधौ भलो ज्ञान समुझायौ । ३३१ उमगीं ब्रजनारि सुभग, ५४ ऊधौ मन अभिमान बढायौ । २६३ उरग लियो हरि को लपटाइ । ६१ ऊधौ मन न भए दस बीस । २८८ उलटि पग कैसैं दीन्हौ नद । २२८ ऊधौ मन नहिं हाथ हमारैं । २८८ उलटी रीति तिहारी ऊधौ, २८४ ऊधौ मन माने की बात । ३१८ ऊधौ अँखियां अति अनुरागी । २८६ ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं । ३३६ ऊधौ इक पतिया हमरी लीजे । ३२२ ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं । ३३६ ऊधौ इतनी कहियो जाइ । २६८ ऊधौ मौन साधि रहे । ३०८ ऊधौ इतनी कहियौ जाइ । ३२४ ऊधौ ले चल लै चल । ३०५ ऊधौ इतनी कहियो बात । ३२३ ऊधौ सुधि नाहीं या तन की । ३१६ ऊधौ कहा करैं लै पाती । २७७ ऊधौ सुनहु नैकु जो बात । ३१० ऊधौ कही सु फेरि न कहिए । २८८ ऊधौ हम आजु भईं बड़ भागी । २८२

पदानुक्रमणी ३८७ ऊधो हमरी सौं तुम जाहु । ३०८ ऊधो हमहिं न जोग सिखैये। २६७ ऊधो हरि काहे के अंतरजामी । २८१ ऊधो हरि गुन हम चकडोर । २८४ एक गाउँ के वास वसो हौं, १३५ एक द्यौस कुंजनि मैं माई । २५६ एई सुत नंद अहीर के । २२० ऐसी कुंवरि कहां तुम पाई । १६२ ऐसी प्रीति की बलि जाउँ । ३४५ ऐसी बात कही जनि ऊधो । २८६ ऐसी रिस मैं जो धरि पाऊँ । ७४ ऐसे आपु स्वारथी नैन । १४२ ऐसैं जनि वोलहु नंद लाला । १२४ ऐसी जोग न हम पै होइ । ३०३ ऐसी दान मांगिये नहिं जौ, १२३ ऐसौ सुनियत द्वै वैसाख । ३१२ और सकल अंगनि तैं ऊधो, २८५ कंत सिधारौ मधुसूदन पे, ३४४ कंस नृपति अक्रूर बुलाये । २११ कंस वध्यौ कुविजा कैं काज । २३२ कंस बुलाइ दूत इक लीन्हो । ८७ कन्हैया तू नहिं मोहिं डरात । ७३ कपट करि ब्रजहिं पूतना आई । ५० कपटी नैननि तैं कोउ नाहीँ । १४४ कब देखौँ इहिं भांति कन्हाई । २४० कब री मिले स्याम नहिं जानौँ । १६७ कबहुँ सुधि करत गुपाल हमारी । २७३ कमल-नैनि हरि करो कलेवा । ६१ कर कंपै, कंपन नहिं छूटै । ३६५ करत अचगरी नंद महर की । १२३ करत कान्ह ब्रज-घरनि अचगरी । ७१ करतल-सोभित बान धनुहियां । ३६४ करति अवसेर वृषभानु-नारी । १८० करन दै लोगनि कौं उपहास । १३५ कर पग गहि, अँगुठा मुख मेलत । ५१ करि गए थोडे दिन की प्रीति । २३७ करिहौ मोहन कहूँ संभारि, २५८ करी गोपाल की सब होइ । ३१ कहत नंद जसुमति सौं बात । ६४ कहत स्याम श्रीमुख यह वानी । ११२ कहन लागे मोहन मैया-मैया । ५७ कहाँ रह्यो मेरी मनमोहन । २३० कहा कहति तू मोहिं री माई । १३३ कहा तुम इतनैं हि कौं गरवानी । २०१ कहा भई धनि बावरी, १६३ कहा भयो जो घर कैं लरिका, ७५ कहा भयो मेरो गृह माटी कौ । ३४७ कहा होत जो हरि हित चित धरि, ३१६ कहा हौ ऐसे ही मरि जैहौं । २१६ कहि धौँ री वन बेलि कहूँ तैं, ११४ कहि धौँ सखी बटाऊ को हैं ? ३६६ कहिवे मैं न कछू सक राखी । ३३२ कह्यौ कान्ह सुनि जसुदा मैया । २७३ कहियो जसुमति की आसीस । ३२७ कहियो ठकुराइति हम जानी । २४२ कहि राधा हरि कैसे हैं । १६३ कहि राधा ये को है री । १८० कहि राधिका बात अब सांची । १६६ कहै भामिनी कंत सौं, ११५ (कहौं कहा) अंगनि की सुधि बिसरि गईँ । ८५ काको काको मुख माई बातनि कौं गहिये । १५८ काग-रूप इक दनुज घरचो । ५१ कान्ह कहत दधि-दान न दैहौ ? १२५ कान्ह कह्यो वन रैनि न कीजै, १७८ कान्ह कुंवर की करहु पासनी, ५३ कान्हहिं वरजति किन नंदारानी । ६८

३८८ सूरसागर सार सटीक काहु के कुल तनन विचारत । २० खेलन कैं मिस कुँवरि राधिका, १४८ काहे कौं कहि गए आइहैं, १८६ खेलन कौं मैं जाउँ नहीं ? १६० काहे कौं गोपीनाथ कहावत । २६३ खेलन दूरि जात कत कान्हा । ६२ काहे कौं पर घर छिनु-छिनु जाति । १६० गई वृषभानु-सुता अपने घर । १४७ काहे कौं पिय पियहिं रटति हो, २५५ गए स्याम ग्वालिन घर सूनैं । ७० काहे कौं रोकत मारग सूधौ । ३०६ गए स्याम तिहिं ग्वालिन कैं घर । ६५ काहैं न मुरली सौं हरि जोरैं । ९७ गन गंधर्व देखि सिहात । १३० काहैं पीठि दई हरि मोसौँ । २४२ गरव भयौ ब्रजनारि कौं, ११४ किते दिन हरि-सुमिरन बिनु खोए । ३३ गरुड़-त्रास तैं जौ ह्यां आयौ । ९३ किधौं घन गरजत नहिं उन देसनि । २५१ गहरु जनि लावहु गोकुल जाइ । २६६ कियो जिहिं काज तप गोप-नारी । ११३ गह्यो कर स्याम भुज मल्ल अपने कियो सुर-काज गृह चले ताकैँ । २२४ धाइ, २२१ किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत । ५५ गिरि जनि गिरै स्याम के कर तैं । १०८ कुवरी पूरव तप करि राख्यो । २२४ गिरि पर बरषन लागे बादर । १०६ कुबिजा नहिं तुम देखी है । २३१ गिरिवर स्याम की अनुहारि । १०५ कुल की कानि कहाँ लगि करिहौं । १७४ गुप्त मते की बात कहौं, ३०५ कुल की लाज अकाज कियौ । १७३ गुरु-गृह हम जब वन कौं जात । ३४५ केहिं मारग मैं जाउँ सखी री, ११६ गुरु बिनु ऐसी कौन करै ? २३ कैसे हैं नंद-सुवन कन्हाई । १५८ गोकुलनाथ विराजत डोल । २१० कैसैं मिले पिय स्याम संघाती । ३४८ गोकुल प्रकट भए हरि आइ । ४८ कैसैं री यह हरि करिहैं । २३१ गोपालराइ दधि माँगत अरु रोटी । ५७ कोउ ब्रज वांचत नाहींन पाती । २७७ गोपालराइ निरतत फन-प्रति ऐसे । ६३ कोउ माई आवत हे तनु स्याम । २७१ गोपालराइ हौँ न चरन तजि जैहौँ । २२६ कोउ माई वरजै री या चंदहिं । २५४ गोपालहिं पावैं धौँ किहिं देस । २४१ कोउ माई लैहै री गोपालहिं । १३२ गोपालहिं माखन खान दै । ६६ कोऊ सुनत न बात हमारी । ३३२ गोपी कहति धन्य हम नारी । १२६ कोकिल हरि को बोल सुनाउ । २५२ गोपी सुनहु हरि संदेस । २७५ कोटि करौ तनु प्रकृति न जाइ । २३२ गोपी सुनहु हरि संदेस । २६६ को माता को पिता हमारैं । १२७ ग्वारनि कही ऐसी जाइ । २३० कृपा सिंधु हरि कृपा करो हो । ११७ ग्वारिनि जब देखे नंद-नंदन । १२५ खंजन नैन सुरँग रस माते । २०३ घट भरि दियो स्याम उठाइ । १२१ खेलत मैं को काको गुसैयाँ । ६२ घर घर इहै सब्द पर्यो । २७१ खेलत स्याम, सखा लिए संग । ८८ घरनि-घरनि ब्रज होति बधाई । १०८ खेलत हरि निकसे ब्रज खोरी । १४६ घरहिं जाति मन हरष बढ़ायो । १५६

पदानुक्रमणी ३८६ घर ही के बाढ़े रावरे । २८६ जसुमति जबहि कह्यौ अन्हवावन, ५८ चकई री, चलि चरन-सरोवर, ४१ जसुमति टेरति कुंवर कन्हैया । ६० चरन-कमल वंदौं हरि-राइ । १७ जसुमति तेरौ वारौ कान्ह, ७४ चलत गुपाल के सब चले । २३६ जसुमति मन अभिलाष करै । ५२ चलत जानि चितवहिं ब्रज-जुवती, २१२ जसुमति राधा कुंवरि सँवारति । १४८ चलत देखि जसुमति सुख पावै । ५६ जसोदा हरि पालनै झुलावै । ५० चलन चलन स्याम कहत, २१२ जाइ सबै कंसहि गुहरावहु । १२६ चली वन वेनु सुनत जब धाइ । १११ जागि उठे तब कुंवर कन्हाई । ८६ चलो-किन मानिनि कुंज-कुटीर । १८४ जागौ, जागी हो गोपाल । ६१ चितवनि रोके हूँ न रही । १६२ जा दिन तैं गोपाल चले । २६५ चूक परी हरि की सेवकाई । २३३ - जा दिन तैं हरि दृष्टि परे री । १६७ चोरी करत कान्ह धरि पाए । ६६ जा दिन मन पंछी उडि जैहैं । ३७ चौंकि परी तन की सुध आई । ८० जा दिन संत पाहुने आवत । ४३ जदुपति जानि उद्धव रीति । २६० जान जु पाए हौं हरि नीकैं । ६७ जदुपति लख्यौ तिहिँ मुसुकात । २६२ जानि करि बावरी जनि होहु । २८३ जननि, हौं अनुचर रघुपति को । ३६८ जापर दीनानाथ ढरै । २१ जनि कोउ काहू के बस होहि । २४८ जीवन मुख देखे को नीको । ३०६ जब ऊधो यह बात कही । २६३ जुवति इक आवति देखी स्याम । १२१ जब तैं प्रीति स्याम सों कीन्ही । १६८ जेंवत कान्ह नंद इकठोरे । ६३ जब तैं सुंदर बदन निहार्यौ । २८५ जैसे तुम गज को पाउँ छुडायौ । २१ जब मैं इहां तैं जु गयौ । ३२८ जैहै कहाँ मोतिसरि मोरी । १७७ जब हरि मुरली अधर धरत । ८४ , जो जन ऊधौ मोहिं न विसारत, ३३७ जबहिं कह्यो ये स्याम नहीं । २७१ जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै । २८३ जबहिं चले ऊधो मधुवन तैं, २६६ जो पै हिरदै मांझ हरी । ३०२ जबहिं बन मुरली श्रवन परी । ११० जो सुख होत गुपालहिं गाए । २४ जबहिं स्याम तन, अति बिस्तार्यो । ६२ जो कोउ विरहिनि को दुख जानै । ३१८ जबही रथ अक्रूर चढ़े । २१४ जौ तुमहीं हो सबके राजा । १२८ जमुना-जल बिहरति ब्रज-नारी । १६२ जो देखैं द्रुम के तरैं, ११६ जमुना तट देखे नंद-नंदन । १०१ जौ बिधना अपवस करि पाऊँ । १६६ जसुदा कहं लैं कीजै कानि । ६६ जौ लौं मन-कामना न छूटै । ४४ जसुदा कान्ह-कान्ह कै बूझै । २२६ झिरकि के नारि, दै गारि गिरि- जसुमति अति हीं भई बिहाल । २१३ धारि तब, ६१ जसुमति करति मोकौं हेत । २६५ झूमक सारी तन गोरैं हो । २०६ जसुमति कहति कान्हु मेरे प्यारे, ७६ झूलत स्याम श्यामा संग । २०७

३८० सूरसागर सार सटीक ठाढ़ी अजिर जसोदा अपनैं, ६० तेरी जीवन मूरि मिलहि किन ढोटा नंद कौ यह री। २१८ माई। ३५८ तजो मन, हरि विमुखनि को संग। ४० तेरैं आवैगे आज सखी हरि, २०८ तब ऊधो हरि निकट बुलायौ। २६७ (तेरैं) भुजनि बहुत बल होइ तब तुम मेरैं काहे कौं आए। ३२६ कन्हैया। १०८ तब तैं इन सबहिनि सचु पायौ। ३३४ तैं कत तोर्यो हार नौ सरि कौ। १२४ तब तैं छीन सरीर सुबाहु। ३२७ तैं ही स्याम भले पहिचाने। १६५ तब तैं नैन रहे इकटकहीं। १४३ तोहि किन रूठन सिखई प्यारी। २०४ तब तैं बहुरि न कोऊ आयौ। ३४८ तोहिं स्याम हम कहाँ दिखावैं। १८२ तब तैं मिटे सब आनन्द। २३३ तो तू उड़ि न जाइ रे काग। २७० तब नागरि जिय गर्व बढ़ायौ। ११५ तो हम मानैं बात तुम्हारी। ३०३ तब नागरि मन हरष भई। १५५ दिन दस घोष चलहु गोपाल। ३३० तब बसुदेव हरषित गात। २२३ दीजै कान्ह कांधे कौ कंवर। १७८ तब रिस कियौ महावत भारि। २२० दूरि करहि बीना कर धरिबौ। २५४ तब हरि कौं टेरत नंदारानी। १५१ दूरहिं तैं देख्यौ बलवीर। ३४४ तबहिं उपंग-सुत आइ गए। २६१ दूसरैं कर बान न लैहौं। ३७० तबहिं स्याम इक बुद्धि उपाई। ७७ देखत नंद कान्ह अति सोवत। ८६ तबहीँ तैं हरि हाथ बिकानी। १६७ देखियत कालिंदी अति कारी। २३८ तब हौं नगर अयोध्या जैहौं। ३७० देखि सखी उत है वह गाउँ। २४५ तरुनी स्याम-रस मतवारि। १३२ देखी माई सुंदरता कौ सागर। १३६ तातैं अति मरियत अपसोसनि। ३५२ देन आए ऊधो मत नौको। २८० तातैं सेइयै श्री जदुआइ। ३२ देवकी मन मन चकित भई। ४७ तिहारौ कृष्न कहत कह जात। ३७ देह घरे कौ कारन सोई। १५५ तुम कहुँ देखे स्याम बिसासी। ११४ दोउ ढोटा गोकुल-नायक मेरे। २२८ तुम कुल वधू निलज जनि व्है हौ। १७१ द्विज कहियौ जदुपति सौं बात। ३४० तुम जानति राधा है छोटी। १७० द्विज पाती दै कहियो स्यामहिं। ३३८ तुम पठवत गोकुल कौं जैहौं। २६४ द्वै मैं एकौ तौ न भई। ३५ तुम पावत हम घोष न जाहिं। ११२ धनि-धनि यह कामरी मोहन तुम बिनु भूलोइ भूलो डोलत। २६ स्याम की। १०० तुम सौं कहा कहौं सुंदर घन। १४३ धनि वृषभानु-सुता बड़ भागिनि। १८५ तुमहिं बिना मन धिक अरु धिक धनि यह वृन्दावन की रेनु। ८५ घरु। १६१ धनुष साला चले नंदलाला। २१८ तुम्हरे देस कागद मसि खूटी। ३५० धन्य धन्य वृषभानु-कुमारी। १८४ तुरत ब्रज जाहु उपँग-सुत आज। २६४ धन्य धन्य वृषभानु-कुमारी, २०३

पदानुक्रमणी ३८१ धीर धरहु फल पावहुगे । १८६ नीकें तप कियो तनु गारि । १०२ धोखैं ही धोखैं दहकायो । ३८ नीकें देहु न मेरी गेंडुरी । १२२ नंद-नंदन तिय-छवि तनु काछे । १८८ नीकें रहियो जसुमति मैया । २६५ नंद-नंदन हँसे नागरी-मुख चितै, १६२ नैंकु निकुज कृपा करि आइये । १६८ नंद करत पूजा, हरि देखत । ६४ नैन करैं सुख, हम दुख पावैं । १४२ नंद कह्यो हो कहँ छांडे हरि । २२८ नैन चपलता कहां गँवाई । १८६ नंद गये खरिकहिं हरि लीन्हे । १४७ नैन न मेरे हाथ रहे । १४१ नंद जसोदा सब ब्रजवासी । ३५७ नैननि सौं झगरौ करिहौं री । १४३ नंद जु के वारे कान्ह, ५७ नैन भए बस मोहन तैं । १४३ नंद-नंदन वृषभानु-किसोरी, २१० नैन सलोने स्याम, २४७ नंद-नंदन सुखदायक है । १८७ नैना घूंघट मैं न समात । १४४ नंद-नंदन सोँ इतनी कहियो । ३२३ नैना भए अनाथ हमारे । ३५१ नंद बवा की बात सुनौ हरि । १४८ पंथी इतनी कहियौ बात । २३५ नद बिदा होइ घोष सिधारो । २२६ पथिक, कहियौ हरि सोँ यह बात । ३५७ नद-महर-घर के पिछवारैं, १७७ पथिक कह्यो ब्रज जाइ, ३५० नंदलाल सौं मेरी मन मान्यो, १३४ पनघट रोके रहत कन्हाई । १२० नंद-सुवन गारुडी बुलावहु । १५१ परम चतुर वृषभानु दुलारी । १८० नंद हरि तुमसोँ कहा कह्यो । २३० परसुराम तेहिं औसर आए । ३६५ नटवर वेष धरे ब्रज आवत । १३८ परी पुकार द्वार गृह गृह तैं, २८० नर तैं जनम पाइ कह कीनौ ? ३३ परेखो कौन बोल कौ कीजे । २३८ नवल नंदनंदन रंगभूमि राजे । २२२ पहिलैं प्रनाम नंदराइ सौँ । २६७ ना जानोँ तबहीँ तैं मोकौँ । १६८ पाती बांचत नंद डराने । ८८ नाथ अनाथनि की सुधि लीजे । २३७ पाती मधुवन तैं आई । २७६ नाथत ब्याल विलम्ब न कीन्हौ । ८२ पाती मधुवन ही तैं आई । २७५ नाना रंग उपजावत स्याम । १८७ पिय तेरेँ बस यौँ री माई । १८३ नाम कहा तेरो री प्यारी । १४६ पिय प्यारी खेलैं जमुन-तीर । २०८ नारद ऋषि नृप तौँ यौँ भाषत । ८७ पिय बिनु नागिनि कारी रात । २४६ नित्य धाम वृन्दावन स्याम । २०७ पियहिं निरखि प्यारी हँसि दीन्हो । १६३ निरखत ऊधो कौँ सुख पायो । २७२ पुनि-पुनि कहति हैं ब्रज नारि । १६४ निरखतिं अंक स्याम सुंदर के, २७६ पूछौ जाइ तात सौँ बात । ८८ निरखि पिय-रूप तिय चकित प्रकृति जो जाकैं अग परी । २८१ भारी । १८८ प्रथम करी हरि माखन-चोरी । ६६ निरगुन कौन देस को वासी ? २८२ प्रथम सनेह दुहुँनि मन जान्यो । १४७ निसि दिन बरषत नैन हमारे । २४३ प्रभु कौ देखो एक सुभाइ । १८

३८२ सूरसागर सार सटीक प्रभु, हौं सब पतितन को टीको । २८ वासुदेव की बड़ी बड़ाई । १८ प्राननाथ हो मेरी सुरति किन बिछुरत श्री ब्रजराज आजु, २१५ करी । १७५ बिछुटी मनो संग तैं हिरनी । ३६७ प्रीति करि काहू सुख न लह्यो । २४७ बिछुरे री मेरे बाल संघाती । २५६ प्रीति करि दीन्ही गरैं छुरी । २३७ विनती किहिं विधि प्रभुहिं प्रीति के वस्य ये हैं मुरारी । १८१ सुनाऊँ? ३७२ प्रीति तो मरिबौऊ न बिचारै । २४८ बिनु गुपाल बैरिन भईं कुंजैं । ३२३ प्रेम न रुक़त हमारे बूतैं । ३१० बिप्र बुलाइ लिए नँदराइ । १०५ फिरि फिरि कहा बनावत बात । २८७ बिलग जनि मानौ ऊधो कारे । ३०१ फिरि फिरि कहा सिखावत मौन । २८७ बिलग हम मानैं ऊधो काको । ३०६ फिरि ब्रज बसो गोकुलनाथ । २४१ बिहँसि राधा कृष्ण अंक लीन्ही । १७५ फिरि ब्रज वसो नंदकुमार । ३३० बिहारी लाल आवहु, आई छाक । ८१ फेंट छांडि मेरी देहु श्रीदामा । ८६ बीर बटाऊ पाती लीजौ । ३५३ बंदो चरन-सरोज तिहारे । २५ बूझत जननि कहाँ हुती प्यारी । १५० बड़ी है राम नाम की ओट । २४ बूझत स्याम कौन तू गोरी । १४६ बडो मंत्र कियौ कुँवर कन्हाई । १५३ बूझति हैं अक्रूरहिं स्याम । २१६ बनत नहिं जमुना कौ ऐबो । १०२ बूझति है रुकमिनी पिय इनमें, ३६० बन तैं आवत धेनु चराए । ८४ वृन्दावन देख्यौ नंद-नंदन, ८१ बनावत रास-मंडल प्यारो । ११८ वेगि ब्रज कौं फिरिए नँदराइ । २२५ बरनों बाल-वेष मुरारि । ५८ बेरसि कीजै नाहिं भामिनी, २०५ बसन हरे सब कदम चढ़ाए । १०३ बैठि मानिनी गहि मौन । २०० बसुद्यौ कुल व्योहार विचारि । २२३ बैठी जननि करति सगुनौंती ! ३७२ बहुरि पपीहा बोल्यौ माई । २५२ ब्रज के बिरही लोग दुखारे । ३२८ बहुरि हरि आवहिंगे किहि काम । २५० ब्रज के लोग फिरत बितताने । १०७ बहुरो देखिबौ इहिं भाँति । २४० ब्रज घर-घर यह बात चलावत । १२२ बहुरो हो ब्रज बात न चाली । ३४६ ब्रज घर-घर सब होति बधाई । २७४ बातैं सुनहु तौ स्याम सुनाऊँ । ३३२ ब्रज-जुवती रस-रास पगीं । १२० बांध्यौ आजु कौन तोहिं छोरे । ७५ ब्रज तैं द्वै रितु पै न गई । ३३० बांसुरी बजाइ आछैं, रंग सौं ब्रज पर बदरा आए गाजन । २५० मुरारी । ८५ ब्रज वसि काके बोल सहौं । १५४ बाजति नंद-अवास बधाई । १०४ ब्रज वसि काके बोल सहौं । २४४ बारक जाइयौ मिलि माधौ । २४२ ब्रज बासिनी को हेत, ३५५ बार-बार मग जोवति माता । २२८ ब्रज बासिनि मोकौं बिसरायौ । १०६ बार सत्तरह जरासंध, ३३८ बज बासिनि-सौँ कह्यौ, ३६२

पदानुक्रमणी ३६३ ब्रजवासी सब सोवत पाये । १९६ (मधुप तुम) कहो कहाँ तैं आए हौ । २७८ ब्रज मैं एक अचंभो देख्यौ । ३३५ मधुवन तुम क्यों रहत हरे । २४० ब्रज मैं एके घरम रह्यौ । ३३३ मधुवन लोगनि को पतियाइ । २८७ ब्रज मैं को उपज्यौ यह भैया । ८२ मन तोसों किती कही समुझाइ । ३८ ब्रज मैं संभ्रम मोहिं भयौ । ३३५ मन में रह्यौ नाहिंन ठौर । ३०० ब्रजहिं बसैं आपुहिं बिसरायौ । १५५ मनहीं मन रीझति महतारी । १६० ब्रत पूरन कियौ नंद-कुमार । १०४ महर-महरि कैं मन यह आई । ८० ब्रह्मा जिनहिं यह आयसु दीन्हौ । १३० महरि, गारुडी कुँवर कन्हाई । १५१ ब्रह्मा बालक-बच्छ हरे । ८२ महरि तैं बड़ी कृपन है माई । ७२ भए सखि नैन सनाथ हमारे । २१८ महरि मुदित उलटाइ के, ५२ भक्त हेत अवतार धरौ । १२७ महा बिरह-बन मांझ परी । १६४ भक्ति कब करिहौ, जनम सिरानौ । ३६ माई कृष्ण-नाम जब तैं स्रवन भजन बिनु कूकर-सूकर जैसौ । ४२ सुन्यौ है री । १६८ भली भई हरि सुरति करी । २७२ माई मेरो मन पिय सौं यौं लाग्यौ, १८६ भवन रवन सबही बिसरायौ । १०१ माई मोकौं चद लग्यौ दुख देन । २५५ भावी काहूँ सौं न टरे । ३२ माई री कैसैं बनै हरि कौ ब्रज भुज भरि लई हिरदय लाइ । १८७ आवन । ३५२ भुजा पकरि ठाढ़े हरि कीन्हे । १७३ मातु-पिता अति त्रास दिखावति । १७४ भूखो भयौ आजु मेरौ बारौ । ७८ मातु-पिता इनके नहिं कोइ । १०८ भूलि नहीं अब मान करौ री । १८६ मातु-पिता तुम्हारे धौं नाहीँ । १११ भूलौ द्विज देखत अपनौ घर । ३४८ माधव या लगि है जग जीजत । ३५८ मथुरा जाति हौं बेचन दहियौ । ७० माधो जू कहा कहौं उनकी गति । ३३३ मथुरा तैं ये आई है । १८१ माधो जू मैं अतिही सचु पायौ । ३३४ मथुरा दिन-दिन अधिक विराजै । २२५ मान करो तुम और सवाई । १६४ मथुरा पुर मैं सोर पर्यो । २१७ मानी माई घन घन अंतर दामिनि । ११३ मथुरा मैं बस वास तुम्हारौ ? १८१ मिलि बिछुरन की वेद न न्यारी । २३८ मथुरा हर्षित आजु भई । २१७ मीठी बातनि में कहा लीजे । २८४ मधुकर आपुन होहिं विराने । ३१६ मुख पर चद दारौ वारि । १४१ मधुकर कहिए काहि सुनाइ । २८३ मुरलिया कपट चतुराई ठानी । ८८ मधुकर प्रीति किये पछितानी । ३१५ मुरलिया मोकौं लागति प्यारी । १०० मधुकर भली करी तुम आए । ३०८ मुरली कहै सु श्याम करैं री । ८८ मधुकर स्याम हमारे ईस । २८८ मुरली की सरि कौन करै । ८७ मधुकर स्याम हमारे चोर । ३०० मुरली तऊ गुपालहिं भावति । ८६ मधुकर हम न होहिं वै बेलि । २७८ मुरली-धुनि स्रवन सुनंत, ८५

३६४ सूरसागर सार सटीक

मुरली स्याम बजावन दै री । १०० मोहिं कहतिं जुवती सब चोर । ७८ मेघनि जाए कही पुकारि । १०८ मोहिं छुवो जनि दूर रहो जू । १६३ (मेरे) कमल नैन प्राननि तैं प्यारे । २१३ यह ऋतु रूसिवे की नाहीँ । २०४ मेरे कहे मैं कोऊ नाहिं । १३३ यह कमरी कमरी करि जानति । १०१ मेरे कुँवर कान्ह बिनु सब कुछ, २३६ यह कहि के तिय धाम गई । १८६ मेरे दधि को हरि स्वाद न पायौ । १२८ यह गोकुल गोपाल उपासी । ३१२ मेरे दुख की ओर नही । ८८ यह जानति तुम नंद-महर-सुत । १२७ (मेरे) नैना बिरह की वेलि बई । २४४ यह बल केतिक जादौराइ । १७३ मेरे मन इतनी सूल रही । २५६ यह महिमा येई पे जानै । १३० (मेरे) मोहन तुमहिं बिना नहिं जैहौँ । २२७ यह वृषभानु-सुता वह को है । १८० मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै । २८ यह सुनि के हँसि मान रही री । १७२ मेरो कह्यो सत्य करि जानो । १०५ यह सुनिके हलधर तहँ धाए । ७६ मैं अपनी सी बहुत करी री । १८५ ये दिन रूसिवे के नाहीँ । २४६ मैं अपने जिय गर्व कियौ । १८४ ये नैन मेरे ढीठ भए री । १४४ मैं अपनौ मन हरत न जान्यौ । १६८ रघुकुल प्रगटे हैं रघुवीर । ३६४ मैं दुहिहौँ मोहिं दुहन सिखावहु । ८० रहिरी मानिनी मान न कीजै । २०२ मैं परदेसिन नारि अकेली । ३६८ रही जहां सो तहां सब ठाढी । २१५ मैं ब्रजवासिन की बलिहारी । ३१८ रहु रे मधुकर मधु मतवारे । २७८ मैं वलि जाउँ कन्हैया की । १७८ राखि लेहु अब नंदकिसोर । १०७ मैं बलि जाउँ स्याम मुख छवि पर । १३७ राखो पति गिरिवर गिरिधारी । ३० मैं बरज्यौ जमुना तट जात । ८६ राधा अतिहिं चतुर प्रवीन । १७८ मैं समुझाई अति अपनौ सो । ३३१ राधा चलहु भवनहिं जाहिँ । १६३ मैं हरि सौं हो मान कियौ री । १८६ राधा जल विहरति सखियनि सँग । १६१ मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी ? ५८ राधा डर डराति घर आई । १८० मैया बहुत बुरो बलदाऊ । ८४ राधा तैं हरि कें रंग राँची । १७० मैया मैं नहिं माखन खायो । ७३ राधा नँद-नदन अनुरागी । १७१ मैया मोहिं दाउ बहुत खिझायौ । ६१ राधा नैन नीर भरि आए । ३५७ मैया री, मोहिं माखन भावै । ६५ राधा परम निर्मल नारि । १६५ मैया हौं न चरैहौं गाइ । ८५ राधा विनय करति मनहीँ मन, १६१ मोकौं माई जमुना जम है रही । २४६ राधा-भवन सखी मिलि आई । १८४ मोसों कहा दुरावति राधा । १५६ राधा माधव, भेंट भई । ३६२ मोसौँ बात सुनहु ब्रज-नारी । १२६ राधा सखी देखि हरषानी । २०२ (मोहन) अपनी गैयाँ घेरि लै । ३२६ राधा सौं माखन हरि मांगत । १२८ मोहन काहे न उगिलौ माटी । ६३ राधा स्याम की प्यारी । १६५

पदानुक्रमणी ३८५ राघहिं मिलेहुँ प्रतीति न आवति । १८८ विनती सुनो दीन की चित दै, २२ राधिका गेह हरि-देह-वासी । १८८ वे हरि सकल ठोर के बासी । ३०७ राधिका बस्य करि स्याम पाए । २०६ वै कह जानैं पीर पराई । २३२ राधिका हृदय तैं धोख टारी । १८२ वै बातैं जमुना-तीर की । ३१० राधे तेरो बदन बिराजत नीको । १५७ संग मिलि कहौँ कासौँ बात । २६१ राधे हरि तेरो नाम विचारैँ । २०१ संग राजति वृषभानु कुमारी । १८५ राधेहिँ स्याम देखो आइ । २०३ सँदेसनि मधुबन कूप भरे । २४८ राम धनुष अरु सायक सांधे । ३६६ सँदेसो देवकी सौं कहियो । २३५ राम भक्त वत्सल निज बानौँ । १८ सखा सुनि एक मेरी बात । २६२ रास रस लीला गाइ सुनाऊँ । १२० सखि मोहिँ हरिदास रस प्याइ । १३४ रास रस भ्रमित भईं ब्रजवाल । ११८ सखियनि मिलि राधा घर लाईँ । १५० रिस करि लीन्ही फेंट छुड़ाइ । ८६ सखी इन नैननि तैं घन हारे । २४३ रीती मटुकी सीस धरैं । १३२ सखी री चातक मोहिँ जियावत । ३५२ री मोहिँ भवन भयानक लागे, २१६ सखी री स्याम सबै इक सार । ३०१ रुकमिनि चलो जन्मभूमि जाहिँ । ३५५ सतगुरु-चरन भजे बिनु विद्या, २८८ रुकमिनि देवी-मदिर आई । ३४० सब खोटे मधुवन के लोग । २८७ रुकमिनि बूझति हैं गोपालहिँ । ३५४ सब तजि भजिये नंद कुमार । ३६ रुकमिनि मोहिँ निमेष न बिसरत, ३५४ सब दिन एकहिँ से नहिँ होतैँ । ३०० रुकमिनि मोहिँ ब्रज बिसरत नाही, ३५४ सबहिनि तैँ हित है जन मेरौ । ३६२ रुकमिनि राधा ऐसैं भेंटी । ३६१ सबै दिन गए विषय के हेतु । ३४ रे मन मूरख जनम गँवायो । ४० सबै सुख लै जु गए ब्रजनाथ । २५८ रोवति महरि फिरति बिततानी । १५२ समुझि न परति तिहारी ऊधौ । २८१ लरिकाई को प्रेम कहो अलि कैसेँ सरद समै हू स्याम न आए । २५३ छूटत । ३१६ सरन गए को को न उबारयो । २० ललकत स्याम मन ललचात । ११६ सहस संकट भरि कमल चलाए । ६४ ललिता प्रेम-विवस भई भारी । १८७ साँवरौ साँवरी रैनि को जायौ । २६३ लाज ओट यह दूरि करौ । १०३ सिखवति चलन जसोदा मैया । ५६ लाल हौँ वारी तेरे मुख पर । ५४ सुन्दर स्याम कमल-दल-लोचन । १७४ लिखि आई ब्रजनाथ की छाप । २७७ सुत मुख देखि जसोदा फूली । ५३ लिखि नहिँ पठवत हैं द्वै बोल । २४५ सुता लए जननी समुझावति । १६१ लै आवहु गोकुल गोपालहिँ । २३४ सुदामा गृह कौँ गमन कियौ । ३४६ लोक-सकुच कुल-कानि तजी । १३३ सुदामा मंदिर देखि डरच्यो । ३४६ लोचन दए कुँवर उघारि । १५२ सुदामा सोचत पंथ चले । ३४४ वायस गहगहात सुनि सुंदरि, ३५६ सुनत हरि रुकमिनी कौ संदेस । ३४०

३८६ सूरसागर सार सटीक सुनहु अनुज, इहिं वन इतननि स्याम कमल पद-नख की सोभा । १४० मिलि, ३६७ स्याम करत हैं मन की चोरी । १६८ सुनहु वात जुवती इक मेरी । १३१ स्याम कर पत्री लिखी बनाइ । २६५ सुनहु महरि तेरो लाडिली, १२२ स्योम कौन कारे की गोरे । १५७ सुनहु सखी राधा की बातैं । १५७ स्याम गरीवनि हूँ के ग्राहक । २० सुनहु सखी राधा की वानी । १५६ स्याम नारि कैं विरह भरे । १६५ सुनहु सखी राधा सरि को है । १७० स्याम पिया सन्मुख नहिं जोवत । १८८ सुनहु स्याम वै सब ब्रज बनिता, ३२६ स्याम भए राधा बस ऐसैं । १८८ सुनि ऊधो मोहिं नैकु न विसरत, ३३६ स्याम भुजनि की सुंदरताई । १३७ सुनियत ऊधो लए संदेसो । २६६ स्याम मिले मोहिं ऐसैं माई । १६७ सुनियत कहूँ द्वारिका बसाई । ३५३ स्याम यह तुमसों क्यों न कह्यो । १५४ सुनियै ब्रज की दसा गुसाईं । ३२८ स्याम राम के गुन नित गाऊँ । ३४२ सुनि राधा अब तोहिं न पत्यैहौँ । १७६ स्याम लियो गिरिराज उठाइ । १०७ सुनि राधा यह कहा विचारै । १८३ स्याम सखा को गेंद चलाई । ८६ सुनि राधे तोहिं स्याम दिखैहैं । १५८ स्याम सखि नीकें देखें नाहिं । १६४ सुनि री मैया काल्हि ही, १७६ स्याम सबनि कौं देखही, ११५ सुनि री सयानी तिय, २०५ स्याम सुख-रासि, रस रासि भारी । १३६ सुनि सुत, एक कथा कहौं प्यारी । ६० - स्यामहिं दोष कहा कहि दीजै । ८८ सुनि सुनि ऊधो आवति हांसी । २८२ स्याम-हृदय जल-सुत की माला, १४० सुनिहि महावत बात हमारी । २२० - स्याम श्यामा कुंज बन आवत । १८० सुनु कपि, वै रघुनाथ नहीं ? ३६८ स्यामा तू अति स्यामहिं भावै । २०० सुने हैं स्याम मधुपुरी जात । २१३ स्रम करिहौ जब मेरी सी । ८६ सुनी गोपी हरि की संदेस । २७८ स्वामी पहिलीं प्रेम संभारो । ३२१ सुनो हो वीर मुष्टिक, चानूर सबै, २२१ हँसत सखनि यह कहत कन्हाई । १२५ सुपनैं हरि आए हौं किलकी । २४६ हँसि बोले गिरिधर रस-बानी । १५४ सुफलक सुत हरि दरसन पायो । २११ हमकौँ हरि की कथा सुनाउ । २८६ सुरगन सहित इंद्र ब्रज आवत । ११० हमवैं कछु सेवा न भई । २७३ सुवा चलि तो वन को रस पीजै । ४१ हमतैं हरि कबहूँ न उदास । ३१३ सैन दे नागरी गई वन कौं । १७७ हम तौ इतने ही सचु पायौ । ३६३ सो दिन त्रिजटी, कहु कब ऐहै ? ३६८ हम तौ कान्ह केलि की भूखी । २६५ सोभा-सिंधु न अत रही री । ४६ हम तौ नंद-घोष के वासी । ३११ सोभित कर नवनीत लिए । ५५ हम तौ सब बातनि सचु पायो । २८२ सोवत नींद आइ गई स्यामहिं । ८५ हम पर काहैं झुर्कात ब्रजनारी । २६६ स्याम अंग जुवती निरखि भुलानी । १३७ हम पर हेत किये रहिवौ । ३२०

पदानुक्रमणी ३६७ हम मति हीन कहा कछु जानें, ३२२ हरि परदेस बहुत दिन लाए। २४८ हमरी सुरति बिसारी वनवारी, १७५ हरि बिनु कौन दरिद्र हरै। ३४६ हमसों उनसों कौन सगाई। ३०३ हरि मुख राधा-राधा बानी, २०४ हमहिं और सो रोके कौन। १२८ हरि-रस तौंडव जाइ कहुँ लहियै। ४३ हमहिं कह्यो हौं स्याम दिखावहु। १६३ हरि सँग खेलति हैं सब फाग। २०६ हमारी जन्मभूमि यह गाउँ। ३७२ हरि सब भाजन फोरि पराने। ७३ हमारे अंबर देहु मुरारी। १०३ हरि सों बूझति रुकमिनी इनमें, ३५८ हमारे निर्धन के धन राम। २४ हरि हरि हरि सुमिरन करौ। ३३८ हमारे प्रभु, औगुन चित न धरौ। २८ हलधर कहत प्रीति जसुमति की। २६५ हमारे माई मोरवा वैर परे। २५१ हलधर सों कहि ग्वालि सुनायो। ७६ हमारैं हरि हारिल की लकरी। ३१५ है कोउ वैसी ही अनुहारि। २७० हमैं नंद नंदन मोल लिये। ३० होत सो जो रघुनाथ ठटै। ३१ हरषि स्याम तिय बांह गही। २०२ हो, ता दिन कजरा मैं दैहौं। २४५ हरि अपनैं आंगन कछु गावत। ५८ हौं इक नई बात सुनि आई। ४८ हरि किलकत जसुमति की कनियां। ५३ हौं इन मोरनि की बलिहारी। ३२० हरि कौं टेरति है नँदरानी। ६३ हौं इहां तेरेहि कारन आयो। ३५६ हरि को मारग दिन प्रति जोवति। २५७ हौं कैसों के दरसन पाऊँ। ३५२ हरि गरुड़ी तहां तब आए। १५२ हौं तौ माई मथुरा ही पै जैहौं। २३४ हरि गोकुल की प्रीति चलाई। २६२ हौं फिरि बहुरि द्वारिका आयौ। ३४६ हरि जू इते दिन कहाँ लगाए। ३६० हौं या माया ही लागी तुम कत हरि जू वै सुख बहुरि कहाँ। ३६१ तोरत। १७५ हरि तेरो भजन कियो न जाइ। २३ हौं संग सांवरे के जैहौं। १३६ हरि तैं भलो सुपति सीता को। ३१७ ज्ञान बिना कहुँवै सुख नाहीँ। २८८ □ □

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