सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८६ सूरसागर सार सटीक सुनहु अनुज, इहिं वन इतननि स्याम कमल पद-नख की सोभा । १४० मिलि, ३६७ स्याम करत हैं मन की चोरी । १६८ सुनहु वात जुवती इक मेरी । १३१ स्याम कर पत्री लिखी बनाइ । २६५ सुनहु महरि तेरो लाडिली, १२२ स्योम कौन कारे की गोरे । १५७ सुनहु सखी राधा की बातैं । १५७ स्याम गरीवनि हूँ के ग्राहक । २० सुनहु सखी राधा की वानी । १५६ स्याम नारि कैं विरह भरे । १६५ सुनहु सखी राधा सरि को है । १७० स्याम पिया सन्मुख नहिं जोवत । १८८ सुनहु स्याम वै सब ब्रज बनिता, ३२६ स्याम भए राधा बस ऐसैं । १८८ सुनि ऊधो मोहिं नैकु न विसरत, ३३६ स्याम भुजनि की सुंदरताई । १३७ सुनियत ऊधो लए संदेसो । २६६ स्याम मिले मोहिं ऐसैं माई । १६७ सुनियत कहूँ द्वारिका बसाई । ३५३ स्याम यह तुमसों क्यों न कह्यो । १५४ सुनियै ब्रज की दसा गुसाईं । ३२८ स्याम राम के गुन नित गाऊँ । ३४२ सुनि राधा अब तोहिं न पत्यैहौँ । १७६ स्याम लियो गिरिराज उठाइ । १०७ सुनि राधा यह कहा विचारै । १८३ स्याम सखा को गेंद चलाई । ८६ सुनि राधे तोहिं स्याम दिखैहैं । १५८ स्याम सखि नीकें देखें नाहिं । १६४ सुनि री मैया काल्हि ही, १७६ स्याम सबनि कौं देखही, ११५ सुनि री सयानी तिय, २०५ स्याम सुख-रासि, रस रासि भारी । १३६ सुनि सुत, एक कथा कहौं प्यारी । ६० - स्यामहिं दोष कहा कहि दीजै । ८८ सुनि सुनि ऊधो आवति हांसी । २८२ स्याम-हृदय जल-सुत की माला, १४० सुनिहि महावत बात हमारी । २२० - स्याम श्यामा कुंज बन आवत । १८० सुनु कपि, वै रघुनाथ नहीं ? ३६८ स्यामा तू अति स्यामहिं भावै । २०० सुने हैं स्याम मधुपुरी जात । २१३ स्रम करिहौ जब मेरी सी । ८६ सुनी गोपी हरि की संदेस । २७८ स्वामी पहिलीं प्रेम संभारो । ३२१ सुनो हो वीर मुष्टिक, चानूर सबै, २२१ हँसत सखनि यह कहत कन्हाई । १२५ सुपनैं हरि आए हौं किलकी । २४६ हँसि बोले गिरिधर रस-बानी । १५४ सुफलक सुत हरि दरसन पायो । २११ हमकौँ हरि की कथा सुनाउ । २८६ सुरगन सहित इंद्र ब्रज आवत । ११० हमवैं कछु सेवा न भई । २७३ सुवा चलि तो वन को रस पीजै । ४१ हमतैं हरि कबहूँ न उदास । ३१३ सैन दे नागरी गई वन कौं । १७७ हम तौ इतने ही सचु पायौ । ३६३ सो दिन त्रिजटी, कहु कब ऐहै ? ३६८ हम तौ कान्ह केलि की भूखी । २६५ सोभा-सिंधु न अत रही री । ४६ हम तौ नंद-घोष के वासी । ३११ सोभित कर नवनीत लिए । ५५ हम तौ सब बातनि सचु पायो । २८२ सोवत नींद आइ गई स्यामहिं । ८५ हम पर काहैं झुर्कात ब्रजनारी । २६६ स्याम अंग जुवती निरखि भुलानी । १३७ हम पर हेत किये रहिवौ । ३२०