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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

३८६ सूरसागर सार सटीक सुनहु अनुज, इहिं वन इतननि स्याम कमल पद-नख की सोभा । १४० मिलि, ३६७ स्याम करत हैं मन की चोरी । १६८ सुनहु वात जुवती इक मेरी । १३१ स्याम कर पत्री लिखी बनाइ । २६५ सुनहु महरि तेरो लाडिली, १२२ स्योम कौन कारे की गोरे । १५७ सुनहु सखी राधा की बातैं । १५७ स्याम गरीवनि हूँ के ग्राहक । २० सुनहु सखी राधा की वानी । १५६ स्याम नारि कैं विरह भरे । १६५ सुनहु सखी राधा सरि को है । १७० स्याम पिया सन्मुख नहिं जोवत । १८८ सुनहु स्याम वै सब ब्रज बनिता, ३२६ स्याम भए राधा बस ऐसैं । १८८ सुनि ऊधो मोहिं नैकु न विसरत, ३३६ स्याम भुजनि की सुंदरताई । १३७ सुनियत ऊधो लए संदेसो । २६६ स्याम मिले मोहिं ऐसैं माई । १६७ सुनियत कहूँ द्वारिका बसाई । ३५३ स्याम यह तुमसों क्यों न कह्यो । १५४ सुनियै ब्रज की दसा गुसाईं । ३२८ स्याम राम के गुन नित गाऊँ । ३४२ सुनि राधा अब तोहिं न पत्यैहौँ । १७६ स्याम लियो गिरिराज उठाइ । १०७ सुनि राधा यह कहा विचारै । १८३ स्याम सखा को गेंद चलाई । ८६ सुनि राधे तोहिं स्याम दिखैहैं । १५८ स्याम सखि नीकें देखें नाहिं । १६४ सुनि री मैया काल्हि ही, १७६ स्याम सबनि कौं देखही, ११५ सुनि री सयानी तिय, २०५ स्याम सुख-रासि, रस रासि भारी । १३६ सुनि सुत, एक कथा कहौं प्यारी । ६० - स्यामहिं दोष कहा कहि दीजै । ८८ सुनि सुनि ऊधो आवति हांसी । २८२ स्याम-हृदय जल-सुत की माला, १४० सुनिहि महावत बात हमारी । २२० - स्याम श्यामा कुंज बन आवत । १८० सुनु कपि, वै रघुनाथ नहीं ? ३६८ स्यामा तू अति स्यामहिं भावै । २०० सुने हैं स्याम मधुपुरी जात । २१३ स्रम करिहौ जब मेरी सी । ८६ सुनी गोपी हरि की संदेस । २७८ स्वामी पहिलीं प्रेम संभारो । ३२१ सुनो हो वीर मुष्टिक, चानूर सबै, २२१ हँसत सखनि यह कहत कन्हाई । १२५ सुपनैं हरि आए हौं किलकी । २४६ हँसि बोले गिरिधर रस-बानी । १५४ सुफलक सुत हरि दरसन पायो । २११ हमकौँ हरि की कथा सुनाउ । २८६ सुरगन सहित इंद्र ब्रज आवत । ११० हमवैं कछु सेवा न भई । २७३ सुवा चलि तो वन को रस पीजै । ४१ हमतैं हरि कबहूँ न उदास । ३१३ सैन दे नागरी गई वन कौं । १७७ हम तौ इतने ही सचु पायौ । ३६३ सो दिन त्रिजटी, कहु कब ऐहै ? ३६८ हम तौ कान्ह केलि की भूखी । २६५ सोभा-सिंधु न अत रही री । ४६ हम तौ नंद-घोष के वासी । ३११ सोभित कर नवनीत लिए । ५५ हम तौ सब बातनि सचु पायो । २८२ सोवत नींद आइ गई स्यामहिं । ८५ हम पर काहैं झुर्कात ब्रजनारी । २६६ स्याम अंग जुवती निरखि भुलानी । १३७ हम पर हेत किये रहिवौ । ३२०

पदानुक्रमणी ३६७ हम मति हीन कहा कछु जानें, ३२२ हरि परदेस बहुत दिन लाए। २४८ हमरी सुरति बिसारी वनवारी, १७५ हरि बिनु कौन दरिद्र हरै। ३४६ हमसों उनसों कौन सगाई। ३०३ हरि मुख राधा-राधा बानी, २०४ हमहिं और सो रोके कौन। १२८ हरि-रस तौंडव जाइ कहुँ लहियै। ४३ हमहिं कह्यो हौं स्याम दिखावहु। १६३ हरि सँग खेलति हैं सब फाग। २०६ हमारी जन्मभूमि यह गाउँ। ३७२ हरि सब भाजन फोरि पराने। ७३ हमारे अंबर देहु मुरारी। १०३ हरि सों बूझति रुकमिनी इनमें, ३५८ हमारे निर्धन के धन राम। २४ हरि हरि हरि सुमिरन करौ। ३३८ हमारे प्रभु, औगुन चित न धरौ। २८ हलधर कहत प्रीति जसुमति की। २६५ हमारे माई मोरवा वैर परे। २५१ हलधर सों कहि ग्वालि सुनायो। ७६ हमारैं हरि हारिल की लकरी। ३१५ है कोउ वैसी ही अनुहारि। २७० हमैं नंद नंदन मोल लिये। ३० होत सो जो रघुनाथ ठटै। ३१ हरषि स्याम तिय बांह गही। २०२ हो, ता दिन कजरा मैं दैहौं। २४५ हरि अपनैं आंगन कछु गावत। ५८ हौं इक नई बात सुनि आई। ४८ हरि किलकत जसुमति की कनियां। ५३ हौं इन मोरनि की बलिहारी। ३२० हरि कौं टेरति है नँदरानी। ६३ हौं इहां तेरेहि कारन आयो। ३५६ हरि को मारग दिन प्रति जोवति। २५७ हौं कैसों के दरसन पाऊँ। ३५२ हरि गरुड़ी तहां तब आए। १५२ हौं तौ माई मथुरा ही पै जैहौं। २३४ हरि गोकुल की प्रीति चलाई। २६२ हौं फिरि बहुरि द्वारिका आयौ। ३४६ हरि जू इते दिन कहाँ लगाए। ३६० हौं या माया ही लागी तुम कत हरि जू वै सुख बहुरि कहाँ। ३६१ तोरत। १७५ हरि तेरो भजन कियो न जाइ। २३ हौं संग सांवरे के जैहौं। १३६ हरि तैं भलो सुपति सीता को। ३१७ ज्ञान बिना कहुँवै सुख नाहीँ। २८८ □ □

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