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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

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पदानुक्रमणी ३६७ हम मति हीन कहा कछु जानें, ३२२ हरि परदेस बहुत दिन लाए। २४८ हमरी सुरति बिसारी वनवारी, १७५ हरि बिनु कौन दरिद्र हरै। ३४६ हमसों उनसों कौन सगाई। ३०३ हरि मुख राधा-राधा बानी, २०४ हमहिं और सो रोके कौन। १२८ हरि-रस तौंडव जाइ कहुँ लहियै। ४३ हमहिं कह्यो हौं स्याम दिखावहु। १६३ हरि सँग खेलति हैं सब फाग। २०६ हमारी जन्मभूमि यह गाउँ। ३७२ हरि सब भाजन फोरि पराने। ७३ हमारे अंबर देहु मुरारी। १०३ हरि सों बूझति रुकमिनी इनमें, ३५८ हमारे निर्धन के धन राम। २४ हरि हरि हरि सुमिरन करौ। ३३८ हमारे प्रभु, औगुन चित न धरौ। २८ हलधर कहत प्रीति जसुमति की। २६५ हमारे माई मोरवा वैर परे। २५१ हलधर सों कहि ग्वालि सुनायो। ७६ हमारैं हरि हारिल की लकरी। ३१५ है कोउ वैसी ही अनुहारि। २७० हमैं नंद नंदन मोल लिये। ३० होत सो जो रघुनाथ ठटै। ३१ हरषि स्याम तिय बांह गही। २०२ हो, ता दिन कजरा मैं दैहौं। २४५ हरि अपनैं आंगन कछु गावत। ५८ हौं इक नई बात सुनि आई। ४८ हरि किलकत जसुमति की कनियां। ५३ हौं इन मोरनि की बलिहारी। ३२० हरि कौं टेरति है नँदरानी। ६३ हौं इहां तेरेहि कारन आयो। ३५६ हरि को मारग दिन प्रति जोवति। २५७ हौं कैसों के दरसन पाऊँ। ३५२ हरि गरुड़ी तहां तब आए। १५२ हौं तौ माई मथुरा ही पै जैहौं। २३४ हरि गोकुल की प्रीति चलाई। २६२ हौं फिरि बहुरि द्वारिका आयौ। ३४६ हरि जू इते दिन कहाँ लगाए। ३६० हौं या माया ही लागी तुम कत हरि जू वै सुख बहुरि कहाँ। ३६१ तोरत। १७५ हरि तेरो भजन कियो न जाइ। २३ हौं संग सांवरे के जैहौं। १३६ हरि तैं भलो सुपति सीता को। ३१७ ज्ञान बिना कहुँवै सुख नाहीँ। २८८ □ □