सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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मुरली स्याम बजावन दै री । १०० मोहिं कहतिं जुवती सब चोर । ७८ मेघनि जाए कही पुकारि । १०८ मोहिं छुवो जनि दूर रहो जू । १६३ (मेरे) कमल नैन प्राननि तैं प्यारे । २१३ यह ऋतु रूसिवे की नाहीँ । २०४ मेरे कहे मैं कोऊ नाहिं । १३३ यह कमरी कमरी करि जानति । १०१ मेरे कुँवर कान्ह बिनु सब कुछ, २३६ यह कहि के तिय धाम गई । १८६ मेरे दधि को हरि स्वाद न पायौ । १२८ यह गोकुल गोपाल उपासी । ३१२ मेरे दुख की ओर नही । ८८ यह जानति तुम नंद-महर-सुत । १२७ (मेरे) नैना बिरह की वेलि बई । २४४ यह बल केतिक जादौराइ । १७३ मेरे मन इतनी सूल रही । २५६ यह महिमा येई पे जानै । १३० (मेरे) मोहन तुमहिं बिना नहिं जैहौँ । २२७ यह वृषभानु-सुता वह को है । १८० मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै । २८ यह सुनि के हँसि मान रही री । १७२ मेरो कह्यो सत्य करि जानो । १०५ यह सुनिके हलधर तहँ धाए । ७६ मैं अपनी सी बहुत करी री । १८५ ये दिन रूसिवे के नाहीँ । २४६ मैं अपने जिय गर्व कियौ । १८४ ये नैन मेरे ढीठ भए री । १४४ मैं अपनौ मन हरत न जान्यौ । १६८ रघुकुल प्रगटे हैं रघुवीर । ३६४ मैं दुहिहौँ मोहिं दुहन सिखावहु । ८० रहिरी मानिनी मान न कीजै । २०२ मैं परदेसिन नारि अकेली । ३६८ रही जहां सो तहां सब ठाढी । २१५ मैं ब्रजवासिन की बलिहारी । ३१८ रहु रे मधुकर मधु मतवारे । २७८ मैं वलि जाउँ कन्हैया की । १७८ राखि लेहु अब नंदकिसोर । १०७ मैं बलि जाउँ स्याम मुख छवि पर । १३७ राखो पति गिरिवर गिरिधारी । ३० मैं बरज्यौ जमुना तट जात । ८६ राधा अतिहिं चतुर प्रवीन । १७८ मैं समुझाई अति अपनौ सो । ३३१ राधा चलहु भवनहिं जाहिँ । १६३ मैं हरि सौं हो मान कियौ री । १८६ राधा जल विहरति सखियनि सँग । १६१ मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी ? ५८ राधा डर डराति घर आई । १८० मैया बहुत बुरो बलदाऊ । ८४ राधा तैं हरि कें रंग राँची । १७० मैया मैं नहिं माखन खायो । ७३ राधा नँद-नदन अनुरागी । १७१ मैया मोहिं दाउ बहुत खिझायौ । ६१ राधा नैन नीर भरि आए । ३५७ मैया री, मोहिं माखन भावै । ६५ राधा परम निर्मल नारि । १६५ मैया हौं न चरैहौं गाइ । ८५ राधा विनय करति मनहीँ मन, १६१ मोकौं माई जमुना जम है रही । २४६ राधा-भवन सखी मिलि आई । १८४ मोसों कहा दुरावति राधा । १५६ राधा माधव, भेंट भई । ३६२ मोसौँ बात सुनहु ब्रज-नारी । १२६ राधा सखी देखि हरषानी । २०२ (मोहन) अपनी गैयाँ घेरि लै । ३२६ राधा सौं माखन हरि मांगत । १२८ मोहन काहे न उगिलौ माटी । ६३ राधा स्याम की प्यारी । १६५