सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८० सूरसागर सार सटीक ठाढ़ी अजिर जसोदा अपनैं, ६० तेरी जीवन मूरि मिलहि किन ढोटा नंद कौ यह री। २१८ माई। ३५८ तजो मन, हरि विमुखनि को संग। ४० तेरैं आवैगे आज सखी हरि, २०८ तब ऊधो हरि निकट बुलायौ। २६७ (तेरैं) भुजनि बहुत बल होइ तब तुम मेरैं काहे कौं आए। ३२६ कन्हैया। १०८ तब तैं इन सबहिनि सचु पायौ। ३३४ तैं कत तोर्यो हार नौ सरि कौ। १२४ तब तैं छीन सरीर सुबाहु। ३२७ तैं ही स्याम भले पहिचाने। १६५ तब तैं नैन रहे इकटकहीं। १४३ तोहि किन रूठन सिखई प्यारी। २०४ तब तैं बहुरि न कोऊ आयौ। ३४८ तोहिं स्याम हम कहाँ दिखावैं। १८२ तब तैं मिटे सब आनन्द। २३३ तो तू उड़ि न जाइ रे काग। २७० तब नागरि जिय गर्व बढ़ायौ। ११५ तो हम मानैं बात तुम्हारी। ३०३ तब नागरि मन हरष भई। १५५ दिन दस घोष चलहु गोपाल। ३३० तब बसुदेव हरषित गात। २२३ दीजै कान्ह कांधे कौ कंवर। १७८ तब रिस कियौ महावत भारि। २२० दूरि करहि बीना कर धरिबौ। २५४ तब हरि कौं टेरत नंदारानी। १५१ दूरहिं तैं देख्यौ बलवीर। ३४४ तबहिं उपंग-सुत आइ गए। २६१ दूसरैं कर बान न लैहौं। ३७० तबहिं स्याम इक बुद्धि उपाई। ७७ देखत नंद कान्ह अति सोवत। ८६ तबहीँ तैं हरि हाथ बिकानी। १६७ देखियत कालिंदी अति कारी। २३८ तब हौं नगर अयोध्या जैहौं। ३७० देखि सखी उत है वह गाउँ। २४५ तरुनी स्याम-रस मतवारि। १३२ देखी माई सुंदरता कौ सागर। १३६ तातैं अति मरियत अपसोसनि। ३५२ देन आए ऊधो मत नौको। २८० तातैं सेइयै श्री जदुआइ। ३२ देवकी मन मन चकित भई। ४७ तिहारौ कृष्न कहत कह जात। ३७ देह घरे कौ कारन सोई। १५५ तुम कहुँ देखे स्याम बिसासी। ११४ दोउ ढोटा गोकुल-नायक मेरे। २२८ तुम कुल वधू निलज जनि व्है हौ। १७१ द्विज कहियौ जदुपति सौं बात। ३४० तुम जानति राधा है छोटी। १७० द्विज पाती दै कहियो स्यामहिं। ३३८ तुम पठवत गोकुल कौं जैहौं। २६४ द्वै मैं एकौ तौ न भई। ३५ तुम पावत हम घोष न जाहिं। ११२ धनि-धनि यह कामरी मोहन तुम बिनु भूलोइ भूलो डोलत। २६ स्याम की। १०० तुम सौं कहा कहौं सुंदर घन। १४३ धनि वृषभानु-सुता बड़ भागिनि। १८५ तुमहिं बिना मन धिक अरु धिक धनि यह वृन्दावन की रेनु। ८५ घरु। १६१ धनुष साला चले नंदलाला। २१८ तुम्हरे देस कागद मसि खूटी। ३५० धन्य धन्य वृषभानु-कुमारी। १८४ तुरत ब्रज जाहु उपँग-सुत आज। २६४ धन्य धन्य वृषभानु-कुमारी, २०३