भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 349, कुल 359 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 349

पदानुक्रमणी ३८६ घर ही के बाढ़े रावरे । २८६ जसुमति जबहि कह्यौ अन्हवावन, ५८ चकई री, चलि चरन-सरोवर, ४१ जसुमति टेरति कुंवर कन्हैया । ६० चरन-कमल वंदौं हरि-राइ । १७ जसुमति तेरौ वारौ कान्ह, ७४ चलत गुपाल के सब चले । २३६ जसुमति मन अभिलाष करै । ५२ चलत जानि चितवहिं ब्रज-जुवती, २१२ जसुमति राधा कुंवरि सँवारति । १४८ चलत देखि जसुमति सुख पावै । ५६ जसोदा हरि पालनै झुलावै । ५० चलन चलन स्याम कहत, २१२ जाइ सबै कंसहि गुहरावहु । १२६ चली वन वेनु सुनत जब धाइ । १११ जागि उठे तब कुंवर कन्हाई । ८६ चलो-किन मानिनि कुंज-कुटीर । १८४ जागौ, जागी हो गोपाल । ६१ चितवनि रोके हूँ न रही । १६२ जा दिन तैं गोपाल चले । २६५ चूक परी हरि की सेवकाई । २३३ - जा दिन तैं हरि दृष्टि परे री । १६७ चोरी करत कान्ह धरि पाए । ६६ जा दिन मन पंछी उडि जैहैं । ३७ चौंकि परी तन की सुध आई । ८० जा दिन संत पाहुने आवत । ४३ जदुपति जानि उद्धव रीति । २६० जान जु पाए हौं हरि नीकैं । ६७ जदुपति लख्यौ तिहिँ मुसुकात । २६२ जानि करि बावरी जनि होहु । २८३ जननि, हौं अनुचर रघुपति को । ३६८ जापर दीनानाथ ढरै । २१ जनि कोउ काहू के बस होहि । २४८ जीवन मुख देखे को नीको । ३०६ जब ऊधो यह बात कही । २६३ जुवति इक आवति देखी स्याम । १२१ जब तैं प्रीति स्याम सों कीन्ही । १६८ जेंवत कान्ह नंद इकठोरे । ६३ जब तैं सुंदर बदन निहार्यौ । २८५ जैसे तुम गज को पाउँ छुडायौ । २१ जब मैं इहां तैं जु गयौ । ३२८ जैहै कहाँ मोतिसरि मोरी । १७७ जब हरि मुरली अधर धरत । ८४ , जो जन ऊधौ मोहिं न विसारत, ३३७ जबहिं कह्यो ये स्याम नहीं । २७१ जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै । २८३ जबहिं चले ऊधो मधुवन तैं, २६६ जो पै हिरदै मांझ हरी । ३०२ जबहिं बन मुरली श्रवन परी । ११० जो सुख होत गुपालहिं गाए । २४ जबहिं स्याम तन, अति बिस्तार्यो । ६२ जो कोउ विरहिनि को दुख जानै । ३१८ जबही रथ अक्रूर चढ़े । २१४ जौ तुमहीं हो सबके राजा । १२८ जमुना-जल बिहरति ब्रज-नारी । १६२ जो देखैं द्रुम के तरैं, ११६ जमुना तट देखे नंद-नंदन । १०१ जौ बिधना अपवस करि पाऊँ । १६६ जसुदा कहं लैं कीजै कानि । ६६ जौ लौं मन-कामना न छूटै । ४४ जसुदा कान्ह-कान्ह कै बूझै । २२६ झिरकि के नारि, दै गारि गिरि- जसुमति अति हीं भई बिहाल । २१३ धारि तब, ६१ जसुमति करति मोकौं हेत । २६५ झूमक सारी तन गोरैं हो । २०६ जसुमति कहति कान्हु मेरे प्यारे, ७६ झूलत स्याम श्यामा संग । २०७