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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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३८८ सूरसागर सार सटीक काहु के कुल तनन विचारत । २० खेलन कैं मिस कुँवरि राधिका, १४८ काहे कौं कहि गए आइहैं, १८६ खेलन कौं मैं जाउँ नहीं ? १६० काहे कौं गोपीनाथ कहावत । २६३ खेलन दूरि जात कत कान्हा । ६२ काहे कौं पर घर छिनु-छिनु जाति । १६० गई वृषभानु-सुता अपने घर । १४७ काहे कौं पिय पियहिं रटति हो, २५५ गए स्याम ग्वालिन घर सूनैं । ७० काहे कौं रोकत मारग सूधौ । ३०६ गए स्याम तिहिं ग्वालिन कैं घर । ६५ काहैं न मुरली सौं हरि जोरैं । ९७ गन गंधर्व देखि सिहात । १३० काहैं पीठि दई हरि मोसौँ । २४२ गरव भयौ ब्रजनारि कौं, ११४ किते दिन हरि-सुमिरन बिनु खोए । ३३ गरुड़-त्रास तैं जौ ह्यां आयौ । ९३ किधौं घन गरजत नहिं उन देसनि । २५१ गहरु जनि लावहु गोकुल जाइ । २६६ कियो जिहिं काज तप गोप-नारी । ११३ गह्यो कर स्याम भुज मल्ल अपने कियो सुर-काज गृह चले ताकैँ । २२४ धाइ, २२१ किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत । ५५ गिरि जनि गिरै स्याम के कर तैं । १०८ कुवरी पूरव तप करि राख्यो । २२४ गिरि पर बरषन लागे बादर । १०६ कुबिजा नहिं तुम देखी है । २३१ गिरिवर स्याम की अनुहारि । १०५ कुल की कानि कहाँ लगि करिहौं । १७४ गुप्त मते की बात कहौं, ३०५ कुल की लाज अकाज कियौ । १७३ गुरु-गृह हम जब वन कौं जात । ३४५ केहिं मारग मैं जाउँ सखी री, ११६ गुरु बिनु ऐसी कौन करै ? २३ कैसे हैं नंद-सुवन कन्हाई । १५८ गोकुलनाथ विराजत डोल । २१० कैसैं मिले पिय स्याम संघाती । ३४८ गोकुल प्रकट भए हरि आइ । ४८ कैसैं री यह हरि करिहैं । २३१ गोपालराइ दधि माँगत अरु रोटी । ५७ कोउ ब्रज वांचत नाहींन पाती । २७७ गोपालराइ निरतत फन-प्रति ऐसे । ६३ कोउ माई आवत हे तनु स्याम । २७१ गोपालराइ हौँ न चरन तजि जैहौँ । २२६ कोउ माई वरजै री या चंदहिं । २५४ गोपालहिं पावैं धौँ किहिं देस । २४१ कोउ माई लैहै री गोपालहिं । १३२ गोपालहिं माखन खान दै । ६६ कोऊ सुनत न बात हमारी । ३३२ गोपी कहति धन्य हम नारी । १२६ कोकिल हरि को बोल सुनाउ । २५२ गोपी सुनहु हरि संदेस । २७५ कोटि करौ तनु प्रकृति न जाइ । २३२ गोपी सुनहु हरि संदेस । २६६ को माता को पिता हमारैं । १२७ ग्वारनि कही ऐसी जाइ । २३० कृपा सिंधु हरि कृपा करो हो । ११७ ग्वारिनि जब देखे नंद-नंदन । १२५ खंजन नैन सुरँग रस माते । २०३ घट भरि दियो स्याम उठाइ । १२१ खेलत मैं को काको गुसैयाँ । ६२ घर घर इहै सब्द पर्यो । २७१ खेलत स्याम, सखा लिए संग । ८८ घरनि-घरनि ब्रज होति बधाई । १०८ खेलत हरि निकसे ब्रज खोरी । १४६ घरहिं जाति मन हरष बढ़ायो । १५६