भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 329, कुल 359 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 329

परिशिष्ट (क) ३६८ सुनु कपि, वै रघुनाथ नहींँ ? जिन रघुनाथ पिनाक पिता-गृह तोरयौ निमिष महीँ । जिन रघुनाथ फेरि भृगुपति-गति डारी काटि तहीँ । जिन रघुनाथ-हाथ खर-दूषन-प्रान हरे सरहीँ । कै रघुनाथ तज्यौ प्रन अपनौ, जोगिन दसा गहीँ ? कै रघुनाथ दुखित कानन, कै नृप भए रघुकुलहीँ । कै रघुनाथ अतुल बल राच्छस दसकंधर डरहीँ ? छाँड़ी नारि बिचारि पवन-सुत लंक बाग बसहीँ । कै हौँ कुटिल, कुचील, कुलच्छनि, तजी कंत तबहीँ । सूरदास स्वामी सौँ कहियौ अब बिरमाहिँ नहीं ॥११॥ अर्थ — सुनो कपि ! (क्या) वे रघुनाथ (अब) नहीं हैं ? जिन रघुनाथ ने (मेरे) पिता (जनक) के घर मे क्षण भर मे (ही) धनुष तोड दिया था । जिन रघुनाथ ने भृगु- पति की गति को वही काट कर (उन्हें) वापस भेज दिया । जिन रघुनाथ के हाथ के बाणों ने खर-दूषण के प्राण हरे (थे) । या तो राम ने अपना प्रण (भक्तो की रक्षा) छोड दिया, (या फिर) योगियों की दशा प्राप्त की (विरक्त हो गये) । या तो दुखी होकर राम कही जंगल मे (घूम रहे हैं) (या फिर) (अयोध्या मे) रघुकुल के राजा हो गये । या तो रघुनाथ राक्षस रावण के अतुल बल से डरते हैं तथा विचार करके उन्होने अपनी स्त्री को त्याग दिया और कही लका के बगीचे मे रहते है । या तो मै कुटिल, गंदी कुलक्षिणी हूँ, तभी कंत (राम) ने (मुझे) त्याग दिया । सूरदास के स्वामी से कहना (कि) अब (कही) रुके नही (जल्द आ जायें) ॥११॥ मैं परदेसिन नारि अकेली । बिनु रघुनाथ और नहिँ कोऊ, मातु-पिता न सहेली । रावन भेष, धरयौ तपसी कौ, कत मैं भिच्छा मेली । अति अज्ञान मूढ़ि-मति मेरी, राम-रेख पग पेली । बिरह-ताप तन अधिक जरावत, जैसेँ दव द्रुम बेली । सूरदास प्रभु वेगि मिलावौ प्रान जात हैं खेली ॥१२॥ अर्थ - मैं परदेशी स्त्री अकेली हूँ । रघुनाथ के बिना (मेरी सहायता करने वाला) और कोई नही (है); न माता-पिता, (ओर) न (कोई) सखियाँ (है) । रावण ने तपस्वी का वेष धारणा किया; मैंने उसे भिक्षा क्यो दी ! (मैं) बहुत अज्ञानी (हूँ) मेरी मति मंद (है), (तभी तो) राम की (बनाई हुई) रेखा (का) (मैंने) उल्लघन किया (मैं उसके बाहर गयी) । विरह का ताप शरीर को अत्यधिक जलाता है; जैसे दावाग्नि पेडो (और) लताओ को (जलाती है) । सूरदास (कहते हैं) (सीता कहती हैं) (कि) प्रभु से जल्द मिलाओ, नही तो प्राण खेल-खेल (मे ही) (व्यर्थ ही) जा रहे हैं ॥१२॥ २४