सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
पृष्ठ 334, कुल 359 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट (ख) अंतर्कथाएँ संकेत सूचना—द्र० = द्रष्टव्य । भा० = भागवत । स्कं० = स्कंध । पू० = पूर्वार्द्ध । उ० = उत्तरार्द्ध । अ० = अध्याय । सू० = सूरसागर (सभा) । प० = पद । अंबरीष—अयोध्या के एक प्रसिद्ध वैष्णव राजा । एकादशी व्रत के पारण का समय निकलते देख व्रत खंडित होने के डर से इन्होंने दुर्वासा ऋषि को भोजन कराने के पहले ही भोजन कर लिया, जिससे क्रुद्ध होकर दुर्वासा ने इन्हें मारने के लिए कृत्या राक्षसी उत्पन्न की । परन्तु विष्णु के सुदर्शन चक्र ने उसे मारकर दुर्वासा का पीछा किया । दुर्वासा रक्षा के लिए विष्णु के पास गए, परन्तु विष्णु ने उन्हें अंबरीष के ही पास क्षमा मांगने के लिए भेज दिया । नारद ने भी उन्हें एक बार भ्रमवश क्रुद्ध होकर अंधकारावृत होने का शाप दिया था । परन्तु सुदर्शन चक्र ने अंधकार का नाश करके नारद का पीछा किया । नारद को विष्णु की शरण मे पहुँचकर ही रक्षा प्राप्त हुई । देखो दुरवासा । द्र० भा०, स्क० ६, अ० ४-५, सू०, प० ४४८ । अक्रूर—कंस की राज-सभा मे अनिच्छा से रहने वाले एक कृष्ण-भक्त यादव जो वसुदेव के भाई भी कहे जाते हैं । जब कंस ने इन्हें धनुष-यज्ञ के अवसर पर कृष्ण- बलराम को मथुरा लाने के लिए भेजा तो इन्हें कृष्ण-दर्शन की लालसा पूर्ण होने का अवसर जान बहुत प्रसन्नता हुई । उसके बाद ये निरंतर कृष्ण के ही निकट रहे । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० ३८-३६, ४८-४६; सू०, प० ३५५७-३५७१, ३६३०-३६३३, ४७७८ । अघासुर—बकासुर और पूतना का छोटा भाई एक असुर जिसे कंस ने कृष्ण को मारने के लिए ब्रज भेजा था । इसने इतने विशालकाय अजगर का रूप धारण किया कि उसका मुख पर्वत की गुफा के समान लगता था । कृष्ण के गोपसखाओं ने उसे गोचारण के समय देखा और उसके मुख की अजगर के मुख से तुलना करते हुए भी वे उसमें बछड़ों के साथ प्रविष्ट हो गए । पीछे से स्वयं श्रीकृष्ण ने जाकर अपना शरीर विस्तृत करके अघासुर का ब्राह्मांड विदीर्ण कर दिया और मृत गोपों और बछडो को अमृत से जिला लिया । द्र० भा०, स्कं० १० पू०, अ० १२; सू०, प० १०४६ ।