भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 333, कुल 359 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 333

परिशिष्ट (क) ३७३ जाम रहत जामिनि के बीतै, तिहिँ अवसर उठि धाऊँ। सकुच होत सुकुमार नीँद मैं, कैसेँ प्रभुहिँ जगाऊँ । दिनकर-किरनि-उदति, ब्रह्मादिक-रुद्रादिक इक ठाऊँ। अगनित भीर अमर-मुनि गन की, तिहिँ तैं ह ठौर न पाऊँ । उठत सभा दिन मधि, सैनापति भीर देखि फिरि आऊँ । न्हात खात सुख करत साहिबी, कैसेँ करि अनखाऊँ । रजनी-मुख आवत गुन-गावत, नारद तुवुर नाऊँ। तुमहीँ कहौ कृपानिधि रघुपति किहिँ गिनती मैँ आऊँ। एक उपाय करौ कमलापति, कहौ तौ कहि समुझाऊँ । पतित उधारन नाम सूर प्रभु, यह रुक्का पहुँचाऊँ ॥१८॥ अर्थ--प्रभु (राम) को किस प्रकार विनती सुनाऊँ ! (विनती सुनाने के लिए) महाराज धीर रघुवीर का (खाली) समय कभी नही पाता हूँ। रात बीतने मे एक याम (३ घंटे का समय) रह जाने पर उस समय उठकर दौड़कर (उनके पास) जाता हूँ। लेकिन संकोच होता है कि प्रभु सुकुमार नीद मे है, (उन्हे) कैसे जगाऊँ। सूर्य की किरण उदित होते (ही) ब्रह्मादि, रुद्रादि अगणित देवता तथा मुनि गण एक जगह एकत्र हो जाते हैं, जिससे (वहां धँसने का) स्थान नही मिलता । दिन के मध्य मे सभा से उठते ही सेनापतियो की भीड़ देखकर वापस चला आता हूँ। नहाते, खाते (तथा) सुख करते (समय) साहब को कैसे नाराज करूँ। सन्ध्या आते ही नारद (तथा) तुंबुरु गुण गाते हुए आते हैं। कृपा निधि ! तुम्ही कहो, (मैं) जिस गिनती मे आऊँ । कमला- पति ! एक उपाय करो । (यदि) कहो तो कहकर समझाऊँ । सूर के प्रभु (राम) का नाम "पतितो का उद्धार करने वाला" (है), यही रुक्के (कागज) पर (लिखकर) पहुँचा दूँ ॥१८॥