सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७२ सूरसागर सार सटीक वीर रूपी वन (जलकर) भस्म हो गये, कुछ (भी) देर नही लगी जैसे ज्वाला से किवाड़े (तथा) वस्त्र (आदि) (जल जाते हैं) सूरदास के प्रभु (राम) ने अपने बाहुवल से पलभर मे (ही) (सबको) कीडा बना दिया ॥१५॥ वैठी जननि करति सगुनौती । लछिमन-राम मिलैँ अव मोकौँ, दोऊ अमोलक मोती । इतनी कहत सुकाग उहाँ तैँ हरी डार उड़ि बैठ्यौ । अंचल गाँठि दई, दुख भाज्यौँ, सुख जु आनि उर पैठ्यौ । जब लौं हौं जीवौं जीवन भर, सदा नाम तव जपियौँ । दधि-ओदन दोना भरि दैहौं, अरु भाइन मैँ थपियौँ । अव कैँ जौ परचौ करि पावौँ, अरु देखौँ भरि आँखि । सूरदास सोने कैँ पानी, मढ़ीं चोंच अरु पाँखि ॥१६॥ अर्थ—माता बैठकर सगुन मनाती है, दोनो अमोल मोती राम (और) लक्ष्मण अब मुझे मिले । इतना कहते ही वहाँ से कौआ उड़कर हरी डाल पर बैठा (माता ने) अंचल मे गांठ दे दी, (उनका) दुख भाग गया, सुख आकर हृदय मे बैठ गया । (माता कौए से कहती हैं) जब तक हम जियेगी जीवन भर सदैव तुम्हारा नाम जपूँगी । दोना भरकर दही तथा चावल दूंगी (और) भाइयो मे, (अन्य पक्षियों में तुझे ही) स्थापित करूंगी (श्रेष्ठ मानूंगी) । अबकी बार यदि (इस शकुन की सत्यता का) परिचय कर पाऊँ, (इसका परीक्षण कर सकूँ) (और) (पुत्रो को) भर आंख देख पाऊँ तो सूरदास (कहते है) (माता कहती है) (कि हे कौए !) तुम्हारी चोंच और पंखों को सोने के पानी से मढाऊंगी ॥१६॥ हमारी जन्मभूमि यह गाउँ । सुनहु सखा सुग्रीव-विभीषन, अवनि अयोध्या नाउँ । देखत वन-उपवन-सरिता-सर, परम मनोहर ठाउँ । अपनी प्रकृति लिए बोलत हौं, सुरपुर मैँ न रहाउँ । ह्याँ के वासी अवलोकत हौं, आनँद उर न समाउँ । सूरदास जौ बिधि न संकोचै, तौ वैकुंठ न जाउँ ॥१७॥ अर्थ-यह गांव हमारी जन्म भूमि (है) । मित्र सुग्रीव तथा विभीषण, सुनो ! यह पृथ्वी पर अयोध्या नाम (से प्रसिद्ध है) । वन, उपवन, नदी तथा सरोवर (से युक्त) यह स्थान बहुत मनोहर (है) । अपनी प्रवृत्ति के अनुरूप कहता हूँ (कि) (मैं) सुरपुर मे (कभी न) रहूँ (ऐसी मेरी इच्छा है) । यहां के निवासियो को देखते ही मेरे हृदय मे आनन्द नही समाता । सूरदास (राम) (कहते हैं) (कि) यदि ब्रह्मा का संकोच न हो तो (मैं) बैकुंठ न जाऊँ ॥१७॥ विनती किहिँ बिधि प्रभुहिँ सुनाऊँ ? महाराज रघुवीर धीर कौँ, समय न कबहुँ पाऊँ ।