सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट (क) ३७१ सुरपुर तैं आयौ रथ सजि कैं रघुपति भए सवार। काँपी भूमि कहा अब ह्वै है, सुमिरत नाम मुरारि। छोभित सिंधु, सेप-सिर कंपित, पवन भयौ गति पंग। इंद्र हँस्यौ, हर हिय विलखान्यौ, जानि वचन कौं भंग। धर-अंवर, दिसि-विदिस, बढ़े अति सायक किरन-समान। मानौ महा-प्रलय के कारन, उदित उभय षट भान। टूटत धुजा-पताक-छत्र-रथ, चाप-चक्र-सिरत्रान। जूझत सुभट जरत ज्यौं नवद्रुम, विनु साखा विनु पान। स्रोनित छिछ उछरि आकासहिं, गज-वाजिनि-सिर लागि। मानौ निकरि तरनि रंध्रनि तैं, उपजी है अति आगि। परि कबंध भहराइ रथनि तैं, उठत मनौ झर जागि। फिरत सृगाल सज्यौ सव काटत, चलत सो सिर लै भागि। रघुपति रिस पावक प्रचंड अति, सीता स्वास समीर। रावन-कुल अरु कुंभकरन वन, सकल सुभट रनधीर। भए भस्म कछु वार न लागी, ज्यौं ज्वाला पट चीर। सूरदास प्रभु आपु बाहुबल, कियौ निमिष मैं कीर ॥१५॥ अर्थ—आज युद्ध मे राम अत्यधिक क्रुद्ध है। ब्रह्मादि विमान पर आरूढ़ होकर (राम-रावण के) संग्राम को देखते हैं। (राम ने अपने) वादल (के समान) (सांवले) शरीर पर कवच सजाकर हाथ मे धनुष धारण किया। समस्त वाणो को पवित्र करके (तथा) सीधा करके, कटि (कमर) में तरकस कसा। देवपुरी से सजकर रथ आया; (उस पर) राम सवार हुए। पृथ्वी कांप गयी, अव (न जाने) क्या होगा ! (सभी लोग घबड़ाकर) मुरारी के नाम का स्मरण करने लगे। सागर क्षुब्ध हो गया, शेषनाग का सिर काँपने लगा। (तथा) हवा की गति पंगु हो गयी (हवा चलना बंद हो गया)। इन्द्र हँस पडे; शंकर जी वचन भंग होता जान हृदय मे दुःखी हुए। पृथ्वी (और) आकाश (तथा) देश-विदेश मे किरण के समान (तेज) वाण वहुत अधिक फैल गये; मानो महा प्रलय के कारण (समुपस्थित जानकर) दोनों षट्भानु (छः सूर्य) अर्थात् २ × ६ = १२, द्वादश आदित्य उदित हो गये है। ध्वजा, पताका, छत्र, रथ, धनुष, चक्र (पहिये) तथा सिरस्त्राण (सिर पर पहनने का टोप) टूटते हैं। जूझने वाले वीर (वैसे ही) जलते हैं जैसे दावाग्नि से विना शाखा तथा पत्तों वाले (होकर) वृक्ष। खून के छींटे आकाश की ओर उछलकर (तथा) हाथियों (और) घोड़ो के सिर पर लग कर (ऐसा दृश्य उपस्थित करते हैं) मानों सूर्य के छिद्रों से निकलकर आग, वहुत धधक रही हो। रथो से धड़ भहराकर गिरते हैं, मानो वडी ज्वाला उत्पन्न हुई हो। शृगाल घूमते है, (योद्धाओ के) सुसज्जित शव को काटते और सिर को लेकर भागते है। राम की अति प्रचंड क्रोध रूपी आग तथा सीता की सांस रूपी समीर से रावण का कुल, कुंभकर्ण (तथा) समस्त रणधीर