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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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वक्तव्य

सूरदास हिन्दी साहित्य के सूर्य माने जाते हैं, किन्तु इस महाकवि की प्रसिद्ध कृति ‘सूरसागर’ का पठन-पाठन रसास्वादन उतना नही हो पा रहा है जितना होना चाहिए । इसके अनेक कारण हैं । एक तो यह ग्रन्थ बहुत बड़ा है । दूसरे इसमें अनेक स्तरों की सामग्री मिश्रित रूप में पाई जाती है । तीसरे इसका कोई अच्छा संस्करण कुछ वर्ष पूर्व तक उपलब्ध नही था । अब सभा का सुन्दर संस्करण दो खंडो मे प्राप्य है, किन्तु उसका मूल्य १२५) है, जो साधारण पाठक अथवा विद्यार्थी की पहुँच के बाहर है ।

उपर्युक्त कठिनाइयों के कारण ‘सूरसागर’ के अनेक संकलन प्रकाशित हुए थे, किन्तु ये प्रायः वेङ्कटेश्वर प्रेस के संस्करण के आधार पर तैयार किए गए थे, अतः वे बहुत संतोषजनक नही थे । इसके अतिरिक्त इन संकलनों मे पदचयन पर जितना ध्यान दिया जाना चाहिए था उतना नही दिया गया था । ‘सूरसुषमा’ मे ये दोष नही है, किन्तु यह केवल सवा-सौ पदों का संग्रह है जो ‘सूरसागर’ का ठीक परिचय कराने के लिए अपर्याप्त है । अतः ‘सूरसागर’ के एक अच्छे प्रतिनिधि संग्रह की आवश्यकता बनी ही रही । ‘सूरसागर सार’ के द्वारा इस आवश्यकता की पूर्ति का यत्न किया गया है ।

प्रस्तुत संग्रह में ‘सूरसागर’ के लगभग ५००० पदो में से ८३१ अत्यन्त उत्कृष्ट पदों का चयन है । संग्रह का आधार सभा का संस्करण है । विनय तथा भक्ति के पदों के उपरान्त कृष्णचरित सम्बन्धी पदो को निम्नलिखित छह शीर्षको में विभक्त किया गया है :—१. गोकुल लीला, २. वृन्दावन लीला, ३. राधा-कृष्ण, ४. मथुरा गमन, ५. उद्धव-संदेश और ६. द्वारिका चरित । एक प्रकार से कृष्ण-जन्म से लेकर राधा- कृष्ण के अन्तिम मिलन तक का सम्पूर्ण कृष्णचरित क्रमबद्ध रूप में इस चयन मे मिल सकेगा । प्रत्येक शीर्षक के अन्तर्गत अनेक उप-शीर्षको मे पद-समूह विभाजित किया गया है । ये उप-शीर्षक भी कथाक्रम के अनुसार है । परिशिष्ट (क) में रामचरित सम्बन्धी कुछ पद भी दे दिए गए हैं ।

इस संकलन के सम्बन्ध मे यह दावा तो नही किया जा सकता कि इसमें सूरसागर के समस्त उत्कृष्ट पद आ गए हैं, किन्तु इतना निश्चित है कि जो पद इसमें है वे अत्यन्त सुन्दर पदो मे से है । केवल कुछ साधारण पद कही-कही कथा की श्रृंखला जोड़ने के लिए रखने पड़े हैं । जो हो, प्रस्तुत चयन मे संग्रहकर्त्ता के ३५ वर्षों के ‘सूरसागर’ के पठन-पाठन और मनन का अनुभव सन्निहित है, तो भी रुचि-विभिन्नता के लिए बराबर स्थान रहेगा । ‘सूरसागर’ के लोकप्रिय न हो सकने का कारण यह