भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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[ ६ ] भी रहा कि इसे भागवत् का रूपान्तर माना जाता रहा और इस रूप में यह ग्रन्थ अत्यन्त शिथिल और असम्बद्ध दिखाई पड़ता है । 'सूरसागर' का कृष्ण-लीला सम्बन्धी रूप, जो वास्तविक 'सूरसागर' है, द्वादशस्कंधी रूपरेखा में छिप जाता है । यही कारण है कि प्रस्तुत संग्रह मे कृष्ण-चरित को ही प्रमुख स्थान दिया गया है । 'सूरसागर' की यह परम्परा अत्यन्त प्राचीन है इतना निश्चित है । महाकवि सूरदास की जीवनी तथा कृति की आलोचना से सम्बद्ध प्रचुर साहित्य उपलब्ध है, किन्तु सूर की काव्यकला का सच्चा मूल्यांकन अभी नही हुआ है । इसमे सन्देह नही कि ऐसे सहज कलात्मक रूप में इतनी, रसानुभूति कही भी अन्यत्र नही मिलती । सहृदय पाठकगण स्वयं रसास्वादन करके इस मत के तथ्य की परीक्षा कर सकते हैं । 'सूरसागर' वास्तव में 'रससागर' है । आशा है कि प्रस्तुत चयन के द्वारा सूरदास की कृति का अधिक परिचय हिन्दी के पाठक तथा विद्यार्थी दोनो ही को सुलभ हो सकेगा । इसके फलस्वरूप वे जो आनन्द प्राप्त करेगे उसी में मै अपने परिश्रम की सफलता समझूंगा । मूल 'सूरसागर सार' के द्वितीय संस्करण के प्रारम्भ में 'महाकवि' सूरदास तथा उनकी रचनाएँ शीर्षक संक्षिप्त कवि-परिचय बढाया गया था तथा अन्त में दो उपयोगी परिशिष्ट दिए गए थे । परिशिष्ट (ख) मे आई हुई प्रमुख अंतर्कथाएँ संक्षेप मे दी गई थी । अन्त मे संकलित पदो की एक पदानुक्रमणी बढ़ा दी गई थी । इन दोनों परिशिष्टो के तैयार करने का सम्पूर्ण श्रेय मेरे प्रिय सहयोगी डॉ० ब्रजेश्वर वर्मा को है । श्री नर्मदेश्वर चतुर्वेदी ने पदानुक्रमणी तैयार करने का कष्ट उठाया था, इसके लिए मैं उनका आभारी हूँ । प्रस्तुत विशेष संस्करण में समस्त पदो का अनुवाद दिया गया है । इस प्रकार का प्रयास लगभग पहली वार हुआ है । 'रामचरितमानस' के सैकडो सटीक संस्करण उपलब्ध हैं जिनके कारण उस ग्रंथ के समझने में पाठको को बहुत सहायता मिलती है । 'सूरसागर सटीक' न मिलने के कारण उसके अनेक स्थलो को विद्यार्थी, अध्यापक तथा सूर-प्रेमी समझ नही पाते है । इस पद संग्रह में इस प्रकार की कठिनाई पाठक को नही मिलेगी । इसका प्रारम्भिक अनुवाद मैंने हिन्दी विभाग के रिसर्चस्कालर श्री विद्याकान्त तिवारी को रखकर करवाया था । उन्होने पूर्ण परिश्रम के साथ इसे पूरा किया । इसके उपरान्त मैंने एक-एक अध्याय अपने पुराने शिष्य-सहयोगियो को दिए कि वे अनुवाद को मूल से मिलाकर ध्यान से देख ले । इसमे मुझे पं० उमाशंकर शुक्ल, श्रीगणेश प्रसाद, डॉ० रघुवंश, डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी, डॉ० राजेन्द्र कुमार तथा डॉ० योगेन्द्र प्रताप सिंह का पूर्ण सहयोग प्राप्त हुआ । अन्त मे मैंने सम्पूर्ण अनुवाद स्वयं देखा और अपने दृष्टिकोण से यत्र-तत्र परिवर्तन किये । जो हो अनुवाद का अंतिम उत्तरदायित्व मुझ पर है । इतना परिश्रम करने पर भी अनेक स्थल अस्पष्ट