सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ सूरसागर सार सटीक यह अपने पति के साथ मिलकर सो गई। सूरदास जी कहते हैं कि कृष्ण के बचन सुनकर यशोदा हंस पडी और गोपी अपना मुंह छिपाने लगी ॥५५॥ महरि तैं बड़ी कृपन है माई । दूध-दही बहु विधि कौ दीनौ, सुत सौं धरति छपाई । बालक बहुत नहीं री तेरैं एकै कुँवर कन्हाई । सोऊ तौ घरही घर डोलतु, माखन खात चोराई । वृद्ध वयस, पूरै पुन्यनि तैं, तैं बहुतै निधि पाई । ताहूँ के खैवे-पीवे कौं, कहा करति चतुराई । सुनहुँ न वचन चतुर नागरि के जसुमति नन्द सुनाई । सूर स्याम कौं चोरी कौं मिस देखन है यह आई ॥५६॥ अर्थ—हे सखी यशोदा तुम बहुत कृपण हो । तुम्हारे पास भगवान् का दिया बहुत-सा दूध-दही है और उसे अपने पुत्र से छिपा कर रखती हो । तुम्हारे लड़के भी तो बहुत नहीं हैं एक ही कुमार कृष्ण है। वह भी घर-घर घूमता रहता है और मक्खन चुराकर खाता है। वृद्धावस्था मे बहुत पुण्यो के पूरा होने से तुमने यह अनन्त निधि (पुत्र) प्राप्त की है उसको भी खिलाने-पिलाने मे तुम चतुरता करती हो । यशोदा ने नंद को सुनाकर कहा कि इस चतुर नागरी के वचन तो सुनिये । सूरदास जी कहते हैं कि (यशोदा ने कहा कि) यह चोरी के बहाने श्याम को देखने आयी है ॥५६॥ अनत सुत गोरस कौं कत जात ? घर सुरभी कारी धौरी कौं माखन माँगि न खात । दिन प्रति सबै उरहने कैं मिस, आवति है उठि प्रात । अनलहते अपराध लगावति, विकटि बनावति बात । निपट निसंक विवादति संमुख, सुनि-सुनि नन्द रिसात । मोसौँ कहतिं कृपन तेरैं घर ढोटाहू न अघात । करि मनुहारि उठाइ गोद लै, बरजति सुत कौं मात । सूर स्याम नित सुनत उरहनौ, दुख पावत तेरौ तात ॥५७॥ अर्थ—हे पुत्र अन्यत्र गोरस के लिये क्यो जाते हो । घर मे 'काली' और 'धौरी' (श्वेतवर्ण वाली) गाय का मक्खन मांगकर नही खाते । उलाहना देने के बहाने सभी गोपियां सवेरे ही उठकर चली आती हैं । (तुम्हारे ऊपर) अनुचित दोषा- रोपण करती हैं और असम्भव बाते बनाती हैं। इस प्रकार गोपियो द्वारा सामने बिलकुल निशंक होकर विवाद करते हुये सुनकर नन्द को क्रोध आता है। गोपियां मुझसे कहती हैं कि कंजूस, (तुम्हारे) घर मे लड़के का भी पेट नही भरता । यशोदा पुत्र को उठाकर उनका दुलार करके रोकती हैं । (सूरदास कहते हैं) कि हे श्याम प्रति- दिन उलाहना सुनकर तुम्हारे पिता जी दुखी होते हैं ॥५७॥