भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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रिस मैं अतिहीँ उपजाई, जानि जननि अभिलाष । सूर स्याम भुज गहे जसोदा, अब बाँधौँ कहि माष ॥६२॥ अर्थ—(गोपी द्वारा कृष्ण की शिकायत करने पर यशोदा आवेश मे आकर कहती हैं) यदि मैं ऐसे क्रोध मे (कृष्ण को) पकड़ पाऊँ तो पकड़ने पर उनका क्या हाल करूँगी यह तुम्हें प्रत्यक्ष दिखाती हूँ । हाथ मे छड़ी लिए नन्दरानी का शरीर क्रोध से काँप रहा है । (बोली) आज यदि कृष्ण को बिना मारे छोड़ँ तो मुझे बाप की सौगन्ध है । इसी बीच (संयोग से) एक अन्य ग्वालिन बांह पकड़ कर कृष्ण को ले आई (और व्यंग्य के साथ बोली) “हे महरि, तुमने बहुत सीधा पुत्र पैदा किया है जो चोली और हार की ओर संकेत करता है ।” इस कथन से (यशोदा को) क्रोध मे और भी अत्यन्त क्रोध उत्पन्न हो गया और कृष्ण ने भी माता के क्रोध के आवेश को समझा । सूरदास कहते हैं कि (तब) यशोदा ने (स्वयं) कृष्ण के हाथ पकड़ लिये और क्रोध से बोली कि अब तुझे बाँधूँगी ॥६२॥ बाँधौँ आजु कौन तोहिँ छोरे । बहुत लँगरई कीन्हौ मोसौँ, भुज गहि रजु ऊखल सौँ जोरे । जननी अति रिस जानि बँधायौ, निरखि बदन, लोचन जल ढोरै । यह सुनि ब्रज-जुवतीँ सब धाईँ कहतिँ कान्ह अब क्यों नहिँ छोरै । ऊखल सौँ गहि बाँधि जसोदा, मारन कौँ साँटी कर तोरै । साँटी देखि ग्वालि पछितानी, विकल भई जहँ-तहँ मुख मोरै । सुनहु महरि ऐसी न बूझिए सुत बाँधति माखन दधि थोरै । सूर स्याम कौँ बहुत सतायौ, चूक परी हम तैँ यह भोरैँ ॥६३॥ अर्थ - (यशोदा कृष्ण से कहती हैं) आज मै तुमको बांध दूंगी देखे (तुम्हे) कौन छुड़ाता है । तुमने मुझसे बहुत शरारत की (ऐसा कहकर) कृष्ण की भुजा को पकड़कर रस्सी को ओखली से बांध देती है । माता को अत्यधिक क्रुद्ध जानकर (कृष्ण ने स्वयं को) बँधा लिया । कृष्ण (जननी के) मुख को देखकर नयनो से जल ढुलकाने लगे । यह सब सुनकर ब्रज युवतियां दौड़ी हुई आईं और (यशोदा से) कहने लगी कि कृष्ण को अब क्यो नही छोड़ देती हो । ओखली से मजबूती से बांधकर यशोदा मारने के लिए छड़ी तोडती हैं । छडी को देखकर गोपियां पछताने लगी और जहाँ-तहाँ मुख दूसरी ओर करने लगी (और बोली) हे महरि, ऐसा करना ठीक नही कि पुत्र को थोडे से मक्खन और दही के लिए बांध दिया है । सूरदास कहते हैं कि (गोपियां सोचती हैं) कि हमने कृष्ण को बहुत सताया । आज हमसे भूल से यह गलती हो गयी ॥६३॥ कहा भयौ जौ घर कैँ लरिका चोरी माखन खायौ । अहो जसोदा कत त्रासति हौ यहै कोखि को जायौ । बालक अजौँ अजान न जानै केतिक दह्यौ लुटायौ । तेरो कहा गयौ ? गोरस कौ गोकुल अत न पायौ ।