भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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७६ सूरसागर सार सटीक हा हा लकुट त्रास दिखरावति आँगन पास बँधायौ । रुदन करत दोउ नैन रचे हैं, मनहुँ कमल-कन छायौ । पौढि रह धरनी पर तिरछैं बिलखि वदन मुरझायौ । सूरदास प्रभु रसिक-सिरोमनि, हँसि करि कंठ लगायौ ॥६४॥ अर्थ—(गोपियां यशोदा को सम्बोधित करते हुए कहती है) घर के बालक के चोरी से मक्खन खाने से क्या हुआ । इस कोख से उत्पन्न सुत को क्यो भयभीत कर रही हो ! यह बालक अभी अनजान है और नही जानता कि कितना दही लुढका दिया ? तेरा इतने से क्या हुआ । (इसने तो गोकुल के वासियो के प्रभूत दधि को खाया तथा लुटाया है जिसके परिणाम का निश्चय आसानी से नही किया जा सकता) । उसकी तुलना में तुम्हारे दधि की क्या मात्रा हो सकती है। दुख है कि तुम कृष्ण को आंगन के पास बांधकर लाठी से भयभीत कर रही हो । रोदन करते हुए इसके नेत्रों पर आंसू कमल-कण की तरह छाये हुए है । धरती पर तिरछे होकर लेटे हुए है और बिलखने के कारण (इनका) मुख मुरझा गया है । सूरदास कहते हैं कि रसिक-शिरो- मणि कृष्ण को (यशोदा ने) हंसकर कण्ठ से लगा लिया ॥६४॥ हलधर सौं कहि ग्वालि सुनायौ । प्रातहिं तैं तुम्हरौ लघु भैया, जसुमति ऊखल बाँधि लगायौ । काहू के लरिकहिं हरि मार्यौ भोरहि आनि तिनहिं गुहरायौ । तबहीं ते बाँधे हरि बैठे, सो हम तुमकौं आनि जनायौ । हम बरजी, बरज्यौ नहिं मानति, सुनतहिं बल आतुर ह्वै धायौ । सूर स्याम बैठे ऊखल लगि, माता उर् तनु अतिहि त्रसायौ । ६५।। अर्थ— हलधर (बलभद्र) से एक गोपी ने बताया कि प्रातःकाल से तुम्हारे छोटे भाई कृष्ण को यशोदा ने ओखली से बांध दिया है । किसी के पुत्र को कृष्ण ने मार दिया था । उसने प्रातः ही (यशोदा को) रक्षा के लिए पुकारा। तब से हरि बँधे हुए बैठे है। इसलिए मैंने तुमको आकर बता दिया । मैंने यशोदा को रोका लेकिन वह मानती नही है। (इसे) सुनते ही बलदाऊ आतुर होकर दौड पडे । सूरदास कहते है कि माता के द्वारा तन और मन से भयभीत किये गये श्याम ओखली के पास बैठे हैं ॥६५॥ यह सुनि कै हलधर तहँ धाए । देखि स्याम ऊखल सौं बाँधे, तबही दोउ लोचन भरि आए । मैं° बरज्यौ कै बार कन्हैया, भली करी दोउ हाथ बँधाए । अजहुँ छाँड़ौगे लँगराई, दोउ कर जोर जननि पै आए । स्यामहिं छोरि मोहिं बाँधै वरु, निकसत सगुन भले नहिं पाए । मेरे प्रान-जिवन-धन कान्हा, तिनके भुज मोहिं बँधे दिखाए । माता सौं कह करौं ढिठाई, सो सरूप कहि नाम सुनाए । सूरदास तब कहति जसोदा दोउ भैया तुम इक मत पाए ॥६६॥