सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगोकुल लीला ७७ अर्थ—यह (कृष्ण को ऊखल से बँधा हुआ) सुनकर हलधर दौड़कर वहाँ गये। कृष्ण को ऊखल से बँधा देखकर उनके दोनों नयन (आँसू से) भर आये। हे कन्हैया, मैंने तुम्हें कितनी वार रोका। अच्छा किया तुमने दोनो हाथ बँधा लिये। क्या अब भी ढीठपन नही छोड़ोगे। [ऐसा कहकर] दोनों हाथ जोड़कर माता के पास आये। [बलराम माता से वोले] कृष्ण को छोड़कर चाहे मुझे बाँध दो। घर से निकलते समय शकुन अच्छे नही मिले। कृष्ण मेरे प्राण और जीवन धन हैं। तूने उनकी बंधी हुई भुजाओं को हमे दिखाया है। (यह भक्त सूर का प्रत्यक्ष कथन भी है)। बलभद्र, कृष्ण के वास्तविक स्वरूप का ध्यान दिलाते हुए कहते हैं कि तुम माता से इतनी शरारत क्यों करते हो। तब यशोदा कहती है कि तुम दोनो भाई एक समान बुद्धि वाले हो ॥६६॥ तबहिं स्याम इक बुद्धि उपाई। जुवती गईं घरनि सब अपने, गृह कारज जननी अटकाई। आपु गए जमलार्जुन-तरु-तरु, परसत पात उठे झहराई। दिए गिराइ धरनि दोऊ तरु, सुत कुवेर के प्रगटे आई। दोउ करजोरि करत दोउ अस्तुति, चारि भुजा तिन्ह प्रगट दिखाई। सूर धन्य ब्रज जनम लियौ हरि, धरती की आपदा नसाई ॥६७॥ अर्थ—जब सभी ब्रज युवतियाँ अपने घर चली गयीं और माता गृह कार्य मे लग गयी तब कृष्ण ने एक सूझ पैदा की। स्वयं जमलार्जुन वृक्ष के नीचे चले गये। उनके स्पर्श मात्र से पत्ते घहरा उठे। उन कृष्ण ने दोनों वृक्षों को पृथ्वी पर गिरा दिया। तब कुवेर के पुत्र प्रकट हुए। दोनो हाथ जोड़कर स्तुति करते हुए उन दोनो को अपनी चारों भुजाओ को प्रत्यक्ष दिखाया। सूरदास कहते है कि कृष्ण ने ब्रज मे जन्म लिया इसलिए ब्रज धन्य है। [उन्होने] पृथ्वी की आपत्ति को नष्ट कर दिया ॥६७॥ अब घर काहूँ कैं जनि जाहु। तुम्हरैं आजु कमी काहे की, कत तुम अनतहिं खाहु। बरै जेंवरी जिहिं तुम बाँधे, परै हाथ भहराइ। नंद मोहिं आतही त्रासत हैं, बाँधें कुँवर कन्हाइ। रोग जाउ मेरे हलधर के, छोरत हो तब स्याम। सूरदास प्रभु खात फिरौ जनि, माखन-दधि तुव धाम ॥६८॥ अर्थ—[यशोदा कृष्ण को वर्जित करती हुई कहती है] अब किसी के घर मत जाना। तुम्हे किस चीज की कमी है जो कि तुम अन्यत्र खाने जाते हो। वह रस्सी जल जाय जिससे बाँधने पर तुम्हारे हाथ मे गडारी पड़ गई है वे हाथ गिर कर टूट पड़े (जो तुम्हे बाँधते थे)। कुँवर कन्हैया को बाँधने पर नन्द भी हमे अत्यधिक भयभीत करते हैं। मेरे बलराम के सभी रोग नष्ट हो जायें, जो मेरे बाँधने पर उस समय उनका बन्धन छोड़ देते थे। सूरदास कहते हैं कि हे कृष्ण तुम घर-घर मत घूमो तुम्हारे घर मे ही मक्खन-दधि बहुत है ॥६८॥