भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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गोकुल लीला ७६ जसुमति कहति कान्ह मेरे प्यारे, अपनैं ही आँगन तुम खेलौ । बोलि लेहु सब सखा संग के, मेरी कह्यौ कबहुँ जिनि पेलौ । ब्रज-बनिता सब चोर कहतिँ तोहिँ, लाजनि सकुचि जात मुख मेरौ । आजु मोहिँ बलराम कहत हे, झूठहिँ नाम धरति हैं तेरौ । जब मोहिँ रिस लागति तब त्रासति, बाँधति, मारति, जैसेँ चेरौ । सूर हँसित ग्वालिन दे तारी, चोर नाम कैसैहुँ सुत फेरौ ॥७१॥ अर्थ - यशोदा कहती हैं कि हे मेरे प्यारे कृष्ण तुम अपने ही आँगन में खेलो । सभी ग्वाल सखाओ को यही बुला लो । तुम मेरी आज्ञा का उल्लंघन कभी मत करो । ब्रज-युवतियाँ तुम्हें चोर कहती हैं और लज्जा से मेरा मुंह सकुचा जाता है । आज मुझसे बलराम बता रहा था कि वे सब तुम्हे झूठे ही बदनाम करती हैं । जब मुझे क्रोध आता है तो (तुम्हे) दास की तरह डरवाती, बांधती तथा मारती हूँ । सूरदास कहते हैं तब गोपियाँ तालियाँ बजाकर हँसती है, अतः हे पुत्र, चोर नाम को कैसे भी वापस करो (बदल डालो) ॥७१॥