भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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वृन्दावन लीला वृन्दावन प्रस्थान महर-महरि कैँ मन यह आई । गोकुल होत उपद्रव दिन प्रति, बसिऐ वृन्दावन मैं जाई । सब गोपनि मिलि सकट साले, सबहिनि के मन मैं यह भाई । सूर जमुन-तट डेरा दीन्हे, पाँच बरष के कुँवर कन्हाई ॥११॥ अर्थ-महर महरि (नन्द और यशोदा) के मन मे यह (भावना) कि गोकुल मे प्रतिदिन बडा उपद्रव होता है, इसलिए वृन्दावन चलकर बसना चाहिये । यह वात सब के मन को रुचिकर प्रतीत हुई और सब ग्वालो ने मिलकर गाड़ियां सजायी । सूरदास कहते हैं सब लोगो ने यमुना के तट पर डेरा डाल दिया । इस समय बालक कृष्ण पाँच वर्ष के थे ॥११॥ गोदोहन मै दुहिहौँ मोहि दुहन सिखावहु । कैसे गहत दोहनी घुटुवनि, कैसे बछरा थन लै लावहु । कैसे लै नोई पग बाँधत, कैसे लै गैया अटकावहु । कैसे धार दूध की बाजति, सोइ-सोइ विधि तुम मोहि बतावहु । निपट भई अब साँझ कन्हैया, गैयनि पै कहूँ चोट लगावहु । सूर स्याम सौँ कहत ग्वाल सब, धेनु दुहन प्रातहि उठि आवहु ॥२॥ अर्थ-[कृष्ण कहते हैं] मैं दुहूँगा, मुझे दुहना 'सिखा दो । दोहनी को घुटनो से कैसे पकड़ते है और बछड़े को थन से कैसे लगाते है रस्सी लेकर कैसे गाय के पैर को बाँधकर अटकाते हैं । दूध की धार कैसे बजती है । इन सभी बातों को मुझे बताओ । [ग्वाल उत्तर देता है] कृष्ण अब बिलकुल सन्ध्या हो गयी है, गायो से कही चोट लगा लोगे । सूरदास कहते है कि कृष्ण से सभी ग्वाल कहते हैं कि गाय दुहने के लिए प्रातःकाल उठकर आओ ॥२॥ गो चारण आजु मैं गाइ चरावन जैहौँ । वृन्दावन के भाँति भाँति फल अपने कर मैं खैहौँ । ऐसी बात कहौ जनि बारे, देखौ अपनी भाँति । तनक तनेक पग चलिहौ कैसे, आवत ह्वै है अति राति ।