भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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वृन्दावन लीला ८१ प्रात जात गैया लै चारन, घर आवत हैं साँझ । तुम्हरौ कमल बदन कुम्हिलैहै, रेँगति घामहिँ माँझ । तेरी सौँ, मोहिँ घाम न लागत, भूख नहीं कछु नेक । सूरदास प्रभु कह्यौ न मानत, पर्यौ अपनी टेक ॥३॥ अर्थ—(कृष्ण यशोदा से कहते है) आज मैं गाय चराने जाऊँगा । वृन्दावन के भिन्न-भिन्न प्रकार के फलों को अपने हाथ से खाऊँगा । (यशोदा उत्तर देती हैं) हे बालक, ऐसी बात मत कहो, अपनी भव-वृत्ति तो देखो । तुम छोटे-छोटे पैरों से कैसे चलोगे, आते-आते रात हो जायेगी । प्रातःकाल (ग्वाल) गायों को चराने ले जाते हैं और सायंकाल घर आते हैं । धूप में घूमते-घूमते तुम्हारा कमल की तरह मुख कुम्हला जायेगा । (कृष्ण कहते हैं) तुम्हारी सौगन्ध मुझे धूप नही लगती और न तनिक भी भूख लगती है । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण (यशोदा का) कहना नही मान रहे है और अपनी ही टेक पर अडे हैं ॥३॥ बृन्दावन देख्यौ नँद-नंदन, अतिहिँ परम सुख पायौ । जहँ-जहँ गाइ चरतिं ग्वालनि सँग, तहँ-तहँ आपुन धायौ । बलदाऊ मोकौँ जनि छोड़ौ संग तुम्हारैँ ऐहौँ । कैसेहुँ आजु जसोदा छाँड्यौ, काल्हि न आवन पैहौँ । सोवत मोकौँ टेरि लेहुगे, बाबा नंद-दुहाई । सूर स्याम बिनती करि बल सोँ, सखनि समेत सुनाई ॥४॥ अर्थ—वृन्दावन को देखकर कृष्ण बहुत सुखी हुए । जहाँ-जहाँ ग्वालो के साथ गाये चरती है, वहाँ-वहाँ स्वयं दौड़कर जाते थे । (बलदाऊ से कृष्ण निवेदन करते है) मुझे कही मत छोड़ो क्योंकि मैं (नित्यप्रति) तुम्हारे साथ आऊँगा । (बलदाऊ ने कहा) यशोदा ने आज तुम्हे किसी तरह आने दिया कल नही आने पाओगे । (कृष्ण ने कहा) तुम्हें बाबा नन्द की सौगन्ध है कि (कल) सोते हुए मुझको बुला लेना । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण अन्य मित्रो को सुनाते हुए बलदाऊ से विनती कर रहे है ॥४॥ बिहारी लाल, आवहु, आई छाक । भई अबार, गाइ बहुरावहु, उलटावहु दै हाक । अर्जुन, भोज अरु सुबल, सुदामा, मधुमंगल इक ताक । मिलि बैठे सब जेँवन लागे, बहुत बने कहि पाक । अपनी पत्रावलि सब देखत, जहँ-तहँ फेनि पिराक । सूरदास प्रभु खात ग्वाल सँग, ब्रह्मलोक यह धाक ॥५॥ अर्थ—(ग्वाल कृष्ण को पुकारते हुए कहते है) हे बिहारी लाल आओ, दोपहर का भोजन आ गया है । देर हो रही है । गायो को हँकवाकर वापस लाओ । अर्जुन, भोज, सुबल, सुदामा, मधुमंगल आदि ग्वाल एक ओर एक साथ बैठकर भोजन करने लगे और कहते जाते थे कि पकवान बहुत अच्छे बने हैं । वे सब अपनी पत्तले देखते ६