भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 83

८२ सूरसागर सार सटीक जाते थे जिन पर जहाँ-तहाँ फेनी और गुजिये रक्खी थी । सूरदास कहते हैं कि प्रभु कृष्ण ग्वालों के साथ भोजन कर रहे है इससे ब्रह्मलोक मे एक प्रकार से आतंक हो गया ॥५॥ ब्रज मैँ को उपज्‍यौ यह भैया । संग सखा सब कहत परस्पर, इनके गुन अगमैया । जब तैँ ब्रज अवतार धर्यौ इन, कोउ नहिं घात करैया । तृनावर्त पूतना पछारी, तब अति रहे नन्हैया । कितिक बात यह बका विदार्यौ, धनि जसुमति जिन जैया । सूरदास प्रभु की यह लीला, हम कत जिय पछितैया ॥६॥ अर्थ-(ग्वाल बाल परस्पर बात-चीत करते हुए कहते हैं) भाई ब्रज मे यह किसने जन्म ले लिया है। इनके गुण अगम हैं। जब से इन्होंने ब्रज मे अवतार धारण किया है तब से ब्रज का कोई अनिष्ट करने वाला नही है। तृणावर्त तथा पूतना को विनष्ट करते समय ये बहुत छोटे थे । इन्होंने बकासुर को विदीर्ण कर दिया । ऐसे पुत्र को जन्म देने वाली माता यशोदा धन्य है । सूरदास कहते है कि यह प्रभु की लीला है इसमे हमे (ग्वाल बालो को) विशेष पछताने की क्या आवश्यकता है ॥६॥ आजु जसोदा जाइ कन्हैया महा दुष्ट इक मार्यौ । पन्नग-रूप गिले सिसु गो-सुत इहिँ सब साथ उवार्यौ । गिरि-कंदरा समान भयानक जब अघ बदन पसार्यौ । निडर गोपाल पैठि मुख भीतर, खंड-खड करि डार्यौ । याकै बल हम बदत न काहुहिं सकल भूमि तृन चार्यौ । जीते सबै असुर हम आगैँ, हरि कबहुँ नहिं हार्यौ । हरषि गए सब कहनि महरि सौँ अबहिं अघासुर मार्यौ । सूरदास प्रभु की यह लीला ब्रज कौ काज सँवार्यौ ॥७॥ अर्थ-(ग्वाल यशोदा से कहते है) आज कृष्ण ने एक महा दुष्ट को मार डाला । सर्प रूप में उसने ग्वाल बाल और गाय बछडे सब निगल लिए थे, कृष्ण ने उनका उद्धार किया । पर्वत की कंदरा के समान जब उसने अपने भयंकर पापी मुख को फैलाया तब निर्भय होकर गोपाल ने उसके मुख मे पैठकर उसे खण्ड-खण्ड कर डाला । इनके बल के कारण हम लोग किसी को कुछ समझते नही। सभी जगह की घास चरा डालते है । सभी असुरो को इन्होने हमारे सामने ही हरा दिया किन्तु हरि स्वयं कभी नही हारते । सब लोग प्रसन्न होकर यशोदा से बताने गये कि अभी (कृष्ण ने) अघासुर को मारा । सूरदास कहते है कि प्रभु की इस लीला ने ब्रज के समस्त कारणो को सिद्ध कर दिया ॥७॥ ब्रह्मा वालक-बच्छ हरे । आदि अंत प्रभु अंतरजामी, मनसा तैँ जु करे ।

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