भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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वृन्दावन लीला ८३ सोइ रूप वै बालक गौ-सुत, गोकुल जाइ भरे । एक बरष निसि बासर रहि सँग, काहु न जानि परे । त्रास भयौ अपराध आपु लखि, अस्तुति करत खरे । सूरदास स्वामी मनमोहन, तामैं मन न धरे ॥८॥ अर्थ—ब्रह्मा ने बालक और बछडों को हर लिया । आदि से लेकर अन्त तक प्रभु अन्तरयामी है इसलिए मन से सब को जान लेते हैं । उसी तरह के बालक और बछड़े बना कर उन्होने गोकुल में छोड़ दिए । एक साल तक वे दिन रात उनके साथ रहे पर उन्हे कोई नही पहचान सका । फिर अपना अपराध समझ कर ब्रह्मा को डर लगा और वे खड़े होकर स्तुति करने लगे । सूरदास कहते है कि मनमोहन कृष्ण ने उनके अपराध पर ध्यान नही दिया ॥८॥ आजु कन्हैया बहुत बच्यौ री । खेलत हौ घोष कैं बाहर, कोउ आयौ सिसु रूप रच्यौ री । मिलि गयौ आइ सखा की नाईं; लै चढ़ाइ हरि कंध सच्यौ री । गगन उड़ाइ गयौ लै स्यामहिं, आनि धरनि पर आप दच्यौ री । धर्म सहाइ होत है जहँ-तहँ, श्रम करि पूरव पुन्य पच्यौ री । सूर स्याम अब कैं बचि आए, ब्रज-घर-घर सुख-सिंधु मच्यौ री ॥६॥ अर्थ--कृष्ण आज विशेष रूप से बच गये । जब गाँव के बाहर खेल रहे थे तब बालक का रूप धारण करके कोई (व्यक्ति) आया । वह मित्र की तरह (बाल सखाओ) मे मिल गया और फिर कृष्ण को कंधे पर बिठाकर चलने लगा । कृष्ण को वह आकाश में उड़ा ले गया । पर अपने आप पृथ्वी पर आकर दब गया । धर्म हर स्थल पर सहा- यक होता है और परिश्रम से किया गया पिछले जन्म का पुण्य काम आया । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के इस बार बच जाने पर ब्रज के घर-घर मे सुख का सागर फैल गया (सब बहुत सुखी हुए) ॥६॥ अब कैं राखि लेहु गोपाल । दसहूँ दिसा दुसह दावागिनि, उपजी है इहिं काल । पटकत बाँस, काँस कुस चटकत, लटकत ताल तमाल । उचटत अति अगार, फुटत पर झपटत लपट कराल । धूम धूँधि बाढ़ी घर अम्बर, चमकत बिच-बिच ज्वाल । हरिन, बराह, मोर, चातक, पिक, जरत जीव बेहाल । जनि जिय डरहु, नैन मूँदहु सब, हँसि बोले नंदलाल । सूर अगिनि सब वदन समानी, अभय दिये ब्रज-बाल ॥१०॥ अर्थ - (ब्रजवासी कृष्ण से निवेदन करते है) हे गोपाल, अब हम लोगों की रक्षां करो क्योकि इस समय दशों दिशाओं मे असह्य दावाग्नि उमड़ आयी है। बांस (जलकर) गिर रहे हैं, कांस और कुश चटक रहे हैं। ताल और तमाल के वृक्ष (जलकर) लटकते