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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 85

८४ सूरसागर सार सटीक जा रहे हैं। अंगारे अत्यन्त छिटक रहे हैं। फल फूटते जा रहे हैं। भयंकर लपट-झपटती है। तथा बीच-बीच मे ज्वाला चमक रही है। पृथ्वी तथा आकाश के बीच धुएँ की धुंध बढ गई है। हिरन, शूकर, मोर, चातक, कोयल जल रहे हैं तथा (समस्त) जीव व्याकुल हो रहे हैं। नन्दलाल ने हँसकर कहा कि तुम लोग मन मे मत डरो केवल सब लोग आंखे बन्द कर लो। सूरदास कहते हैं कि समस्त अग्नि (कृष्णजी के) मुख मे समा गई। इस तरह ब्रज के बालको को भय रहित कर दिया ॥११०॥ वन तैं आवत धेनु चराए। संध्या समय साँवरे मुख पर, गो-पद-रज लपटाए । बरह मुकुट कैं निकट लसति लट,मधुप मनौ रुचि पाए । बिलसत सुधा जलज-आनन पर, उड़त न जात उड़ाए । विधि बाहन-भच्छन की माला, राजत उर पहिराए । एक वरन बपु नहिं बड़ छोटे, ग्वाल बने इक धाए । सूरदास बलि लीला प्रभु की जीवत जन जस गाए ॥१११॥ अर्थ—वन से गाय चराकर कृष्ण आ रहे हैं। संध्या के समय उनके श्यामल मुख पर गायो के पैर की (उडायी गयी) धूल लगी है। मोर-मुकुट के निकट (बालो की) लट ऐसी सुशोभित हो रही है मानो भौरे रुचिकर समझ कर एकत्रित हो गये हैं। कमल पर अमृत लिपटा हुआ हो और इसीलिए भौरे उड़ते नही हैं। ब्रह्मा की सवारी (हंस) के चुगने की वस्तु (मोती) की माला वक्षस्थल पर सुशोभित हो रही है। सभी ग्वाल एक वर्ण तथा एक ही आयु के हैं कोई बड़ा छोटा नही है। सूरदास प्रभु की लीला पर न्योछावर होते हैं और कहते हैं कि भक्तजन यश को गाते हुए जीते हैं ॥१११॥ मैया बहुत बुरो बलदाऊ । कहन लग्यौ बन बड़ी तमासौ, सब मौड़ा मिलि आंऊ । मोहूँ कौं चुचकारि गयो लै, जहाँ सघन वन झाऊ । भागि चलौ कहि गयो उहाँ तैं, काटि खाइ रे हाऊ । हौँ डरपौँ कापौं अरु रोवौँ कोउ नहिँ धीर धराऊ । थरसि गयौँ नहिँ भागि सकौँ, वै भागे जात अगाऊ । मोसौँ कहत मोल कौ लीनो, आपु कहावत साऊ । सूरदास गल बड़ी चबाई, तैसेहिं मिले सखाऊ ॥११२॥ अर्थ—(कृष्ण माता यशोदा से शिकायत करते हुए कहते हैं) हे माता बलभद्र बड़ा दुष्ट है। वह वन में कहने लगा कि बड़ा सुन्दर तमाशा है, सब लोग मिलकर आओ। मुझे भी पुचकार कर वही ले गया जहाँ झाऊ का सघन वन था। फिर वहाँ से यह कह कर भाग गया कि 'हउआ' काट खायेगा। मै डर से कांप रहा था और रो रहा था लेकिन कोई भी धीरज नही बंधाता था। मैं डर से स्तम्भित हो गया इसलिये भाग

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