सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवृन्दावन लीला ८५ भी नहीं सका। वे आगे-आगे भागते चले जा रहे थे। मुझसे कहते हैं कि तू मोल का लिया हुआ है और अपने को साहु कहते हैं। बलदाऊ तो दुष्ट है ही, वैसे ही उसे मित्र भी मिल गये हैं ॥१२॥ मैया हौं न चरैहौँ गाइ। सिगरे ग्वाल घिरावत मोसौँ, मेरे पाइ पिराइ। जौ न पत्याहि पूछि बलदाउहिँ, अपनी सौंह दिवाइ। यह सुनि माइ जसोदा ग्वालनि, गारी देति रिसाइ। मैं पठवति अपने लरिका कौ, आवै मन बहराइ। सूर स्याम मेरौ अति बालक, मारत ताहि रिगाइ ॥१३॥ अर्थ—(कृष्ण यशोदा से कहते हैं) माता मैं गाय नही चराऊँगा। सब लोग मुझसे गाय इकट्ठा करवाते है जिससे मेरे पैर दर्द करने लगते हैं। यदि तुम्हे विश्वास न हो तो बलदाऊ को अपनी सौगध दिलाकर पूँछ लो। यह सुनकर यशोदा ग्वाल वालो पर क्रोधित होती हैं और उन्हे गाली देती है। मैं अपने पुत्र को मन बहलाने के लिए भेजती हूँ, लेकिन मेरे अति छोटे बालक को ये घुमा-घुमाकर मारे डालते हैं (परेशान कर देते हैं) ॥१३॥ धनि यह वृन्दावन की रेनु। नंद-किसोर चरावत गैयाँ, मुखहिं बजावत बेनु। मन-मोहन को ध्यान धरैं जिय, अति सुख पावत चैनु। चलत कहाँ मन और पुरी तन, जहाँ कछु लैन न दैनु। इहाँ रहहु जहाँ जूठनि पावहु, व्रजवासिनि कै ऐनु। सूरदास ह्यॉ की सरवरि नहि, कल्पवृच्छ सुर-धैनु ॥१४॥ अर्थ—वृन्दावन की धूलि धन्य है जहाँ कृष्ण गऊ चराते हैं और वंशी बजाते हैं, जो मन को मोहित करने वाले कृष्ण का ध्यान धरता है वह अत्यन्त सुख तथा चैन प्राप्त करता है। यह मन अन्य पुरी की ओर कहां जा सकता हैं जहां न कुछ लेना है न देना। यही रहो, जहां कृष्ण की जूठन (प्रसाद) प्राप्त होगी, क्योकि यही ब्रजवासियों का घर है। सूरदास कहते हैं कि यहाँ की समता कल्पवृक्ष तथा कामधेनु नही प्राप्त कर सकते ॥१४॥ सोवत नींद आइ गई स्यामहिँ। महरि उठो पौढ़ाइ दुहुँनि कौँ, आपु लगी गृह कामहिँ। बरजति है घर के लोगनि कौँ, हरुऐं लै-लै नामहिँ। गाढ़ै बोलि न पावत कोऊ, डर मोहन बलरामहिँ। सिव सनकादि अंत नहिँ पावत ध्यावत अह-निस जामहिँ। सूरदास-प्रभु ब्रह्म सनातन, सो सोवत नंद धामहिँ ॥१५॥