सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवृन्दावन लीला अति कोमल तनु धरचौ कन्हाई। गए तहाँ जहँ काली सोवत, उरग-नारि देखत अकुलाई । कह्यौ कौन कौ बालक है तू, बार-बार कहि, भागि न जाई । छनकहि मैं जरि भस्म होइगौ, जब देखे उठि जाग जम्हाई । उरग-नारि की बानी सुनि कैं आपु हँसे मन मैं मुसुकाई । मोकौं कंस पठायौ देखन, तू याकौं अब देहि जगाई । कहा कंस दिखरावत इनकौ, एकहि फूँकहिं मैं जरि जाई । पुनि-पुनि कहत सूर के प्रभु कौ, तू अब काहे न जाइ पराई ॥२६॥ अर्थ--अत्यधिक कोमल शरीर धारण करके कृष्ण वहाँ गये जहाँ काली सो रहा था। (कृष्ण को) देखते ही साँप की पत्नी आकुल हो गयी। (उसने) कहा कि तुम किसके बालक हो । वार-वार कहती हूँ तुम भाग क्यो नही जाते। जब जागकर (काली) जम्हाई लेगा तुम क्षण भर मे जलकर राख हो जाओगे । साँप की पत्नी की वाणी सुनकर कृष्ण मन मे मुस्कराकर हँसे । (कृष्ण ने कहा) मुझे कंस ने देखने भेजा है इसलिए तुम अब इसे जगा दो। कंस इनको कैसे दिखलाता है (क्योकि) एक ही फूंक मे तो तुम (जीव) जल जाओगे। (नाग-पत्नी) वार-बार कहती है तू अब क्यों नही भाग जाता ॥२६॥ झिरकि कै नारि, दै गारि गिरिधारि तब, पूँछ पर लात दै अहि जगायौ । उठ्यौ अकुलाइ, डर पाइ खग-राज कौं, देखि बालक गरब अति बढ़ायौ । पूँछ लीन्ही झटकि, धरनि सौं गहि पटकि फुंकरयौ लटकि करि क्रोध फूले । पूँछ राखी चाँपि, रिसनि काली काँपि, देखि सब साँपि-अवसान भूले । करत फन घात, विष जात उतराति अति, नीर जरि जात, नहिं गात परसै । सूर के स्याम प्रभु लोक अभिराम, बिनु ज्ञान अहिराज विष ज्वाल बरसै ॥३०॥ अर्थ-(कृष्ण ने) नाग की पत्नी को झिड़ककर, गाली देकर पूँछ पर पैर रख कर नाग को जगा दिया। वह व्याकुल होकर गरुड के भय से डर कर उठा । (किन्तु) बालक को देखकर अत्यधिक गर्व (काली ने) पूँछ को झटक लिया और (पूँछ- को) पृथ्वी पर पटक कर, क्रोध से फूँककर, तिरछा होकर फुंकार किया। (कृष्ण ने) पूँछ को दबाये रखा । क्रोध से काली नाग कांप उठा । (उसे) देखकर सभी सांपिनिओं की सुध-बुध भूल गयी । फण से चोट करने पर विष उतरा जाता है जिससे पानी जल जाता है (लेकिन) (कृष्ण के) शरीर को छू (तक) नही जाता । सूरदास कहते हैं कि लोक को सुन्दर लगने वाले (कृष्ण को बिना जाने नागों का राजा काली) विष की ज्वाला बरसाता है ॥३०॥ उरग लियौ हरि कौ लपटाइ । गर्व-वचन कहि-कहि रुख भाषत, मोकौं नहिं जानत अहिराइ । लियौ लपेटि चरन तैं सिख लौं, अति इहिं मोसौ करत ढिठाइ ।