सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८० सूरसागर सार सटीक तारी दै-दै हँसत सबै मिलि, स्याम गए तुम भाजि डराइ । रोवत चले श्रीदामा घर कौं, जसुमति आगैं कहिहौं जाइ । सखा सखा कहि स्याम पुकारयौ, गेंद आपनौ लेहु न आइ । सूर स्याम पीताम्बर काछे, कूद परे दह में भहराइ ॥२६॥ अर्थ-कृष्ण ने क्रोध मे आकर अपने कमर बन्द को छुड़ा लिया। सभी मित्र खड़े होकर देखते रहे और वे स्वयं कदम्ब पर दौड़कर चढ गये । ताली दे-देकर सभी हँसते हैं कि कृष्ण तुम डर कर भाग गये । (तब) श्रीदामा रोते हुए घर की तरफ चले (यह कहते हुए) यशोदा जी के आगे जाकर कहूँगा । कृष्ण ने उन्हे 'सखा-सखा' कहकर पुकारा (और कहा) कि आकर अपनी गेंद लेते क्यो नही । सूरदास कहते है कि कृष्ण पीताम्बर को कसकर दह मे झोके के साथ कूद पडे ॥२६॥ चौंकि परी तन की सुध आई । आजु कहा ब्रज सोर मचायौ, तब जान्यौ दह गिर्यौ कन्हाई । पुत्र-पुत्र कहिकै उठि दौरी, व्याकुल जमुना-तीरहिं धाई । ब्रज-वनिता सब संगहिं लागीं आइ गए बल, अग्रज भाई । जननी व्याकुल देखि प्रबोधत धीरज करि नीकें जदुराई । सूर स्याम कौं नैंकुं नहीं डर, जनि तू रोवै जसुमति माई ॥२७॥ अर्थ-(यशोदा) कृष्ण के शरीर की याद करके चौक उठी । आज ब्रज मे शोर क्यो मचा हुआ है । तब उन्हे पता चला कि कृष्ण दह मे गिर गये है (तब यशोदा) पुत्र-पुत्र कहती हुई व्याकुल होकर यमुना के तट को उठकर दौड़ी । ब्रज की सभी स्त्रियां साथ मे लग गयीं और (कृष्ण के) बडे भाई बलराम भी आ गये । माता को व्याकुल देखकर (बलराम) समझाते है कि धीरज धरो, कृष्ण अच्छे सकुशल हैं । सूरदास कहते हैं, कृष्ण को कोई डर नही है, हे यशोदा मां तुम मत रोओ ॥२७॥ जसुमति टेरति कुँवर कन्हैया । आगैं देखि कहत बलरामहिं, कहाँ रह्यौ तुव भैया । मेरौ भैया आवत अबहीँ तोहिं दिखाऊँ मैया । धीरज करहु, नैंकु तुम देखहु, यह सुनि लेत बलैया । पुनि यह कहति मोहिं परमोधत, धरनि गिरी मुरझैया । सूर बिना सुत भइ अति व्याकुल, मेरौ बाल कन्हैया ॥२८॥ अर्थ-यशोदा कृष्ण को पुकारती हैं । बलराम को आगे देखकर कहती हैं कि तुम्हारा भाई कहां है । (बलराम कहते है) मेरा भाई अभी आता है, और मां तुम्हे (अभी) दिखाता हूँ । तुम धीरज धरो और थोडी देर देखो । यह सुनकर (यशोदा) बलैया लेती हैं । फिर यह कहती हुई कि (तुम) मुझे (मात्र) समझा रहे हो धरती पर मुरझाकर गिर गयी । सूरदास कहते हैं कि (यह सोचती हुई) मेरा कृष्ण बालक है, बिना पुत्र के यशोदा अत्यधिक व्याकुल हो गयी ॥२८॥