भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 359 में से

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वृन्दावन लीला ६३ अर्थ—(कृष्ण ने) नाग को नाथते देर नही की। पैर से दबाकर, गरदन के बल तोड़कर, नाक को फोड़कर पकड़ लिया। (फिर) कूदकर उसके मस्तक पर (कृष्ण) चढ़ गये। (तब) काली विचार करता है कि कानों में यह वाणी सुनी थी कि ब्रज मे अवतार होगा। उन्ही (भगवान् ने) गोकुल में आकर अवतार लिया है। मैं यह बात जान गया। अपने हज़ार मुख से विनती करने लगा कि हे जग के पिता तुम धन्य हो। बार-बार शरण, कहकर पुकार की कि हे गोपाल रक्षा करो। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ने जब नाग को व्याकुल देखा तो वे (विष्णु रूप में) प्रकट हुए ॥३३॥ आवत उरग नाथे स्याम। नंद जसुदा गोपी, कहत हैं बलराम। मोर-मुकुट, विसाल लोचन, स्रवन कुंडल लोल। कोटि पितांबर, बेष नटवर, नृतत फन प्रति डोल। देव दिवि दुंदुभि बजावत, सुमन गन बरषाइ। सूर स्याम बिलोकि ब्रज-जन, मातु-पितु सुख पाइ ॥३४॥ अर्थ—नंद, यशोदा, गोप गोपी तथा बलराम सभी कह रहे हैं कि नाग को नाथ कर कृष्ण आ रहे हैं। (उनके सिर पर) मोर का मुकुट है। (उनके) नेत्र विशाल हैं। कानों मे चंचल कुंडल, कटि (कमर) मे पीताम्बर, नटवर का वेष धरे (कृष्ण काली के) प्रति फण पर घूम-घूम कर नाच रहे है। देव आकाश में दुन्दुभी बजा रहे हैं तथा अत्यधिक फूल बरसा रहे हैं। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण को देखकर ब्रजवासी तथा माता-पिता सुखी हो गये ॥३४॥ गोपाल राइ निरतत फन-प्रति ऐसे। गिरि पर आए बादर देखत, मोर अनंदित जैसे। डोलत मुकुट सीस पर हरि के, कुडल-मडित-गड। पीत बसन, दामिन मनु घन पर, तापर सुर-कोदंड। उरग-नारि आगैं, सब ठाढ़ी, मुख मुख अस्तुति गावैं। सूर स्याम अपराध छमहु अब, हम मागैं पति पावैं ॥३५॥ अर्थ —गोपालराज प्रति फण पर ऐसे नाच रहे हैं जैसे पर्वत पर आये हुए बादल को देखते ही मोर आनंदित होकर (नाचने लगता है)। कृष्ण के सिर पर मुकुट डोल रहा है। कनपटी कुंडल से सुशोभित है। पीताम्बर (ऐसा लग रहा है) मानो बादलो के ऊपर बिजली और उस पर इन्द्रधनुष हो। नाग की सभी पत्नियां आगे खडी होकर (अपने-अपने) मुख से स्तुति (गा) कर रही है। सूरदास कहते हैं कि (वे कहती हैं) हे कृष्ण अब अपराध को क्षमा कर दीजिए। हम लोग यह मांगते हैं कि हमारे पति फिर मिल जावे ॥३५॥ गरुड़-त्रास तैं जौ ह्वां आयीं। तौ प्रभु चरन-कमल फन-फन प्रति, अपनें सीस धरायीं।

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