सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ सूरसागर सार सटीक ------------। ऋषि साप दियौ खगपति कौं, ह्याँ तब रह्यौ छपाइ । प्रभु वाहन-डर भाजि बच्यौ, नातरु लेतौ खाइ । यह सुनि कृपा करी नंद-नंदन, चरन चिह्न प्रगटाए । सूरदास प्रभु अभय ताहि करि, उरग-द्वीप पहुँचाए ॥३६॥ अर्थ-(काली नाग कहता है) गरुड के भय से जो यहां आ गया तभी प्रभु के चरण-कमल को प्रत्येक फन से अपने सिर पर धारण कराया । वे ऋषि धन्य हैं जिन्होने पक्षियो के स्वामी (गरुड) को शाप दिया था (कि गरुड़ कालीदह में नही आ सकता) तभी (मै) यहाँ छिपा रहा । प्रभु की सवारी (गरुड) के डर से भाग कर बच गया नही तो (वह मुझे) खा लेता । यह सुनकर नन्द के नन्दन (पुत्र) कृष्ण ने कृपा करके (उसके मस्तक पर) चरण के चिह्न को प्रकट किया । सूरदास कहते है कि कृष्ण ने उसे भयरहित करके नागो के द्वीप मे भेज दिया ॥३६॥ सहस सकट भरि कमल चलाए । अपनी समसरि और गोप जे, तिनकौं साथ पठाए । और बहुत काँवरि दधि-माखन, अहिरनि काँधैं जोरि । नृप कैं हाथ पत्र यह दीजौ, विनती कीजो मोरि । मेरो नाम नृपति सौं लीजौ, स्याम कमल लै आए । कोटि कमल आपुन नृप-मांगे, तीनि कोटि हैं पाए । नृपति हमहिं अपनौं करि जानी, तुम लायक हम नाहिं । सूरदास कहियौ नृप आगैं, तुमहिं छाँड़ि कहँ जाहिं ! ॥३७॥ अर्थ-हजारो गाड़ियो को कमल से भरकर चला दिया । अपनी समानता वाले जो और गोप थे उनको साथ भेज दिया और अहीरो के कन्धे से जोडकर दही और मक्खन से भरी बहँगियो को (भेजा) । (किसी गोप के हाथ मे पत्र देकर नन्द कहते है) राजा (कस) के हाथ मे यह पत्र देकर मेरी (ओर से) विनती करना । नृपति से मेरा नाम लेकर (कहना) कृष्ण कमल ले आये । हे राजा आपने एक करोड कमल मांगे थे, तीन करोड पा गये है । राजा हम लोगो को अपना ही करके जानिए । (यद्यपि) आपके लायक हम नही है । सूरदास कहते हैं कि (नन्द ने कहा) कि राजा के आगे कहना कि तुम्हे छोड़कर (हम लोग) कहां जायें ॥३७॥ मुरली जब हरि मुरली अधर धरत । थिर चर, चर थिर, पवन थकित रहैं, जमुनाजल न बहत । खग मोहैं, मृग-जूथ भुलाहीँ, निरखि मदन-छवि छरत । पसु मोहैं सुरभी विथकित, तृन दंतनि टेकि रहत । सुक सनकादि सकल मुनि मोहैं, ध्यान न तनक गहत । सूरदास भाग हैं तिनके, जे या सुखहिं लहत ॥३८॥