सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवृन्दावन लीला ६३
अर्थ-जब कृष्ण बांसुरी ओठ पर धरते हैं तब न चलने वाले चलकर, गरदन के और चलने वाले स्थिर हो जाते हैं। पवन शिथिल (थका हुआ) रह जाता है। यमुना के पानी का बहना बन्द हो जाता है। पक्षी मोहित हो जाते हैं। (इसे) देखकर काम- देव की छवि अपहृत (क्षीण) हो जाती है। पशु मोह जाते हैं। गाये विशेष रूप से थकित होकर तृण को दांतों से पकड़े रह जाती हैं। शुकदेव, सनक आदि मुनि मोह मे पड़ जाते हैं और तनिक भी ध्यान नही धर पाते। सूरदास कहते है कि वे भाग्यवान है जो इस सुख को पाते हैं ॥३८॥ (कहौं कहा) अंगनि की सुधि विसरि गईँ। स्याम अधर मृदु सुनत मुरलिका, चकित नारि भईँ। जो जैसे तौ तैसे रहि गई, सुख-दुख कह्यौ न जाई। लिखी चित्र सी सूर ह्वै रहिं इकटक पत्र बिसराई ॥३६॥ अर्थ- (केसे कहूँ) (स्त्रियाँ) अंगो की याद ही (ज्ञान) भूल गईं। कृष्ण के ओठो से वंशी की मीठी (ध्वनि) सुनते ही स्त्रियां चकित हो गयीं। जो जैसे थी वैसे ही रह गयी। सुख-दुख (कुछ) कहा नही जाता। सूरदास कहते हैं कि वे सब विना पलक मारे एकटक देखती हुई लिखे हुए चित्र की तरह हो गयी ॥३६॥ मुरली धुनि श्रवन सुनत, भवन रहि न परै। ऐसी को चतुर नारि, धीरज मन धरै। सुर नर मुनि सुनत सुधि न, सिव-समाधि टरै। अपनी गति तजत पवन, सरिता नहिं ढरै। मोहन मुख-मुरली, मन मोहिनि बस करै। सूरदास सुनत श्रवन, सुधा-सिंधु भरै ॥४०॥ अर्थ-मुरली की आवाज कान से सुनते ही कोई (गोपी) भवन में रह नही पाती। कौन ऐसी चतुर स्त्री है जो मन में धीरज धर सके। (वंशी की ध्वनि) सुनते ही देवता, मनुष्य, मुनि सभी की स्मृति खो जाती है। शिव की समाधि डिग जाती है। हवा अपनी चाल को छोड़ देता है। नदी का बहना रुक जाता है। मोहन के मुख की वंशी मन को मोहने वाली नारियो को बस मे कर लेती है। सूरदास कहते हैं कि कानों से सुनते ही (कानो मे) अमृत का सागर भर जाता है ॥४०॥ बाँसुरी बजाइ आछे रंग सौं मुरारी। सुनि कै धुनि छूटि गई, संकर की तारी। वेद पढ़न भूलि गए, ब्रह्मा ब्रह्मचारी। रसना गुन कहि न सकै, ऐसी सुधि बिसारी। इंद्र-सभा थकित भइ, लगी जय करारी। रंभा कौ मान मिट्यौ, भूली नृत कारी।