सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ सूरसागर सार सटीक अर्थ-मुरली से कृष्ण क्यो न सम्बन्ध जोड़ें। उसे बार-बार ओठो से क्यो न लगायें जो उन्हे अचानक सहज ही मिल गयी। उसे क्यों न हाथ में धारण करें और क्यों न गरदन झुकाये। क्यों न शरीर को तीन जगह टेढ़ा करके, उसके मन को चुरायें। क्यों न इस तरह से उसके अधीन रहें क्योकि (स्वयं) अहीर हैं और वह (मुरली) बांस है। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण उसे हाथ से नही टालते, (लेकर ही) वन-वन गाय चराते हैं ॥४६॥ मुरलिया कपट चतुरई ठानी । कैसेँ मिलि गई नंद-नंदन कीँ, उन नाहिंँन पहिचानी । इक वह नारि, वचन मुख मीठे, सुनत स्याम ललचाने । जाँति-पांति की कौन चलावै, वाकैँ रंग भुलाने । जाकौ मन मानत है जासौँ, सौ तहँई सुख मानै । सूर स्याम वाके गुन गावत, वह हरि के गुन गानै ॥४७॥ अर्थ-मुरली ने कपटपूर्ण चतुरता ठान ली है। यह नन्द के पुत्र कृष्ण को कैसे मिल गयी। उनकी यह (कोई) पहचानी भी तो नही है। एक तो वह स्त्री है (दूसरे) उसके वचन मीठे हैं, सुनते ही कृष्ण ललचा गये। जाति-पांति की कौन चर्चा करे (बस) उसी के रंग मे भूल गये। जिसका मन जिसे स्वीकार करता है उसे वही सुख मिलता है। सूरदास कहते हैं कि वह कृष्ण का गुण गाती है, कृष्ण उसका गुण गाते हैं ॥४७॥ स्यामहिँ दोप कहा कहि दीजै । कहा बात मुरली सौँ कहियै, सब अपनैहिँ सिर लीजै । हमहीँ कहति बजावहु मोहन, यह नहीँ तब जानी । हम जानी यह बाँस बँसुरिया, को जानै पटरानी । वारे तैँ मुँह लागत-लागत, अब ह्वैँ गई सयानी । सुनहु सूर हम भोरी-भारी, याकी अकथ कहानी ॥४८॥ अर्थ-कृष्ण को कैसे दोप दिया जाय। वंशी से क्या कहे, सब (दोप) अपने ही सिर पर लीजिए। हमी तो कहते है कि मोहन इसे बजाओ। तब यह (सब) हमने नही जाना था। हमने तो समझा था कि यह वांस की वाँसुरी (ही) है, (इसे)पटरानी कौन समझ सकता है। वचपन से मुँह लगते-लगते अब सयानी हो गई है। सूरदास सुनो हम सब भोली-भाली हैं, इसकी कहानी तो न कही जा सकने वाली है ॥४८॥ मुरली कहै सु स्याम करैँ री । वाही कैँ वस भये रहत हैं वाकैँ रग ठरैँ री । घर-वन, रैन-दिना सँग डोलत, कर तैँ करत न न्यारी । आई वन बलाइ यह हमकौँ, कहा दीजियै गारी ।