भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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वृन्दावन लीला ६७ वासिनियां चकित हो गई (और कहने लगी) कि इस (मुरली) का आना अच्छा नही हुआ । तुम लोग सावधान क्यों नही हो जाती हो क्योकि (यह) एक बुरी बला पैदा हो गयी है । सूरदास कहते है कि (हम ब्रज की नारियों के ऊपर कृष्ण ने) उसे सोत के रूप में घोषित कर दिया है ॥४३॥ अबहीं तैं हम सबनि बिसारी । ऐसे बस्य भये हरि बाके, जाति न दसा बिचारी । कबहूँ कर पल्लव पर राखत, कबहूँ अधर लै धारी । कबहुँ लगाइ लेत हिरदै सौं, नैंकहुँ करत न न्यारी । मुरली स्याम किए बस अपनैं, जे कहियत गिरधारी । सूरदास प्रभु कैं तन-मन-धन, बाँस बँसुरिया प्यारी ॥४४॥ अर्थ—अब तो (वे कृष्ण) हम सब को भूल गये । कृष्ण ऐसे उसके वश मे हो गये है कि उस दशा का विचार ही नही किया जा सकता । कभी उसे हाथ रूपी पल्लवो पर रखते हैं कभी ओंठ पर धारण करते हैं। कभी (उसे) हृदय से लगा लेते हैं, (इस तरह) तनिक समय के लिए भी (वंशी को) अपने से अलग नही करते । मुरली ने (ऐसे) कृष्ण को वश मे कर लिया है जो कि गिरधारी कहे जाते है । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण को तन, मन, धन सभी से बाँस की बाँसुरी प्रिय है ॥४४॥ मुरली की सरि कौन करै । नंद-नंदन त्रिभुवन-पति नागर सो जौ बस्य करै । जबहीं जब मन आवत तब तब अधरनि पान करै । रहत स्याम आधीन सदाई आयसु तिनहिं करै । ऐसी भई मोहिनी माई मोहन मोह करै । सुनहु सूर याके गुन ऐसे ऐसी करनि करै ॥४५॥ अर्थ—मुरली की समता कौन कर सकता है । जिस (मुरली ने) तीनों लोक के स्वामी नन्द के पुत्र चतुर कृष्ण को अपने वश मे कर लिया है। जब-जब (उसके) मन मे आता है तब-तब ओठ का पान करती है। कृष्ण सदा उसी के आधीन रहते हैं और उसी की आज्ञा का पालन करते हैं। वह ऐसी मोहने वाली है कि मोहन को ही मोह लेती है। सूरदास सुनो इसके गुण ऐसे ही है और ऐसी इसकी करनी है ॥४५॥ काहैं न मुरली सौं हरि जोरैं । काहैं न अधरनि धरैं जु पुनि-पुनि मिली अचानक भीरैं । काहैं नहीं ताहि कर धारैं, क्यौं नहिं ग्रीव नवावैं । काहैं न तनु त्रिभंगा करि राखैं ताके मनहिं चुरावैं । काहैं न यौ आधीन रहैं ह्वैं, वै अहीर वह बेनु । सूर स्याम कर तैं नहिं टारत, बन-बन चारत धेनु ॥४६॥ ७