भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 838 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 145

१२२ सूर्य सिद्धान्त विज्ञान भाष्य—सूर्य सिद्धान्त में त्रिकोणमिति के इतने ही सम्बन्ध (ratios) दिये हुए हैं। इनसे कोटिज्या (cosine) जानने के लिए यह नियम व्यवहार में लाया गया है कि यदि किसी कोण की ज्या दी हुई हो तो उस कोण को ६०° में से घटाने पर जो कोण होता है उसकी कोटिज्या का मान भी वही होता है अर्थात् किसी कोण की ज्या उसके पूरक कोण की कोटिज्या के समान होती है। किसी कोण की स्पर्श रेखा (tangent) का मान आजकल की तरह नहीं दिया मिलता है, परन्तु इसका व्यवहार अप्रत्यक्ष रूप से कोण की ज्या को उसकी कोटिज्या से भाग देकर किया गया है । यदि कोण का मान ऐसा है कि ऊपर दिये हुए पिंडों के बीच में पड़ता है तो उसकी ज्या, कोटिज्या या उत्क्रमज्या त्रैराशिक (proportional parts) से जानने की विधि अगले ३१-३४ श्लोकों में बतलायी गयी है । इसी प्रकार यदि ज्या का मान ज्ञात हो तो उससे धनु (कोण) निकालने की रीति भी इन्हीं श्लोकों में है । भास्कराचार्य जी ने ज्या, कोटिज्या जानने की रीति और सूक्ष्म रीति से बतलायी है । ज्या के पर्याय क्रमज्या, भुजज्या, बाहुज्या, अर्द्धज्या इत्यादि तथा कोटिज्या के लम्बज्या भी प्रयोग किये गये हैं । परमापक्रमज्या तु सप्तरन्ध्रगुणेन्द्रवः । तद्गुणा ज्या त्रिज्योवाप्ता तच्चापं क्रान्तिरिष्यते ॥२८॥ अनुवाद—(२८) परम क्रान्ति ज्या का मान १३६७ कला है । इसको (भोगांश की) ज्या से गुणा करके, फल को त्रिज्या से भाग देने पर जो आवे वह जिस धनु (कोण) की ज्या हो वही क्रान्ति का मान होता है । स व प चित्र २५