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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

प्रस्तावना एवं सूर्यसिद्धान्त मंगलाचरण

सूर्य सिद्धान्त विज्ञान भाष्य भाग १ तथा २ भाष्यकार स्व. महावीर प्रसाद श्रीवास्तव द शु स दा शू पृथ्वी शुक्र की कक्षा सूर्य डा. रत्नाकुमारी स्वाध्याय संस्थान विज्ञान परिषद् भवन, इलाहाबाद-२

परिचय : स्वर्गीय महाबीर प्रसाद श्रीवास्तव का जन्म कार्तिक शुक्ल २ संवत् १९४४ वि० तदनुसार १८ अक्टूबर, १८८७ में ग्राम बिझौली तहसील हँडिया, जिला इलाहाबाद में हुआ। इलाहाबाद के ही कायस्थ पाठशाला से हाईस्कूल (१९०६) तथा इन्टर परीक्षाएं (१९०८) और म्योर कालेज से बी० एस-सी० परीक्षा (१९१०) उत्तीर्ण की। आर्थिक स्थिति ठीक न होने से नौकरी कर ली। सं० १९७६ वि० के कार्तिक मास से 'सूर्य-सिद्धान्त' का 'विज्ञानभाष्य' लिखना प्रारम्भ किया जो विज्ञान परिषद् की मासिक पत्रिका में लगातार छपता रहा। यह भाष्य सं० १९८७ वि० में समाप्त हुआ। विज्ञान परिषद् ने इसे दो भागों में पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित किया था। इस ग्रंथ पर उन्हें मंगलाप्रसाद पारितोषिक तथा चुन्नूलाल पुरस्कार प्राप्त हुए। इस ग्रंथ का प्रथम संस्करण समाप्त हो जाने पर पाठकों के सतत अनुरोध पर इसे पुनः प्रकाशित किया जा रहा है। अपनी कोटि की 'विज्ञान भाष्य' टीका से युक्त यह ग्रंथ 'सूर्य- सिद्धान्त' प्राचीन भारतीय साहित्य की अमूल्य निधि एवं हिन्दी का एक गौरव ग्रंथ है। 'सूर्य-सिद्धान्त' समस्त पुस्तकालयों एवं जिज्ञासुओं के लिए उपयोगी एवं संग्रहणीय है।

सूर्य-सिद्धान्त का विज्ञान भाष्य प्रथम खण्ड [ मध्यमाधिकार, स्पष्टाधिकार, त्रिप्रश्नाधिकार ] भाष्यकार स्व० महावीरप्रसाद श्रीवास्तव डा० रत्नकुमारी स्वाध्याय संस्थान इलाहाबाद

प्रकाशक डा० रत्नकुमारी स्वाध्याय संस्थान विज्ञान परिषद् भवन महर्षि दयानन्द मार्ग इलाहाबाद-२११००२ फोन नं० ५४४१३ प्रथम संस्करण, दिसम्बर १६४० [ विज्ञान परिषद् प्रयाग से ] द्वितीय संस्करण, मार्च १६८२ (स्वाध्याय संस्थान से) मूल्य रु० ४०.०० मुद्रक सरयू प्रसाद पाण्डेय नागरी प्रेस, अलोपीबाग, इलाहाबाद

प्रस्तावना डॉ० रत्नकुमारी स्वाध्याय संस्थान की ओर से प्राचीन वाङ्‌मय के कई ग्रन्थ प्रकाशित किये जा चुके हैं—स्वामी सत्यप्रकाश और डॉ० उषा ज्योतिष्मती के ग्रन्थ, जैसे बख्शाली-मेनुस्क्रिप्ट, शुल्ब-सूत्र ( संस्कृत और अंग्रेजी में ) । इसी परम्परा में हम स्वर्गीय श्री महावीर प्रसाद श्रीवास्तव के सूर्य-सिद्धान्त का विज्ञान भाष्य प्रकाशित कर रहे हैं । यह गौरव हमें विज्ञान-परिषद्, प्रयाग की उदारता से प्राप्त हुआ है, जिसके लिए हम परिषद् के अधिकारियों के उपकृत हैं । इस ग्रन्थ के प्रकाशन का व्ययसाध्य कार्य सम्पादित करना हमारे लिए कठिन होता यदि हमें करनाल के आदरणीय रायसाहब चौधरी प्रताप सिंह जी और उनके द्वारा स्थापित न्यास द्वारा आर्थिक सहायता प्राप्त नहीं हुई होती । चौधरी साहेब के हम अत्यन्त आभारी हैं । अभी हम प्रथम खण्ड प्रकाशित कर रहे हैं, जिसमें मध्यमाधिकार, स्पष्टाधिकार ओर त्रिप्रश्नाधिकार हैं । दूसरे खण्ड में यह ग्रन्थ संपूर्ण समाप्त हो जायगा । एस ० रंगनायकी, फाल्गुनी पूर्णिमा एम०एस-सी०, डी० फिल, डी० एस-सी० ६ मार्च, १६८२. निदेशिका

भूमिका स्वामी दयानन्द ने अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में १८७४ ई० में विद्या- लयों के स्नातकों के पठन-पाठन का एक समग्र पाठ्य-क्रम दिया। इस पाठ्यक्रम का एक ऐतिहासिक महत्व है क्योंकि ऋषि दयानन्द की इस आयोजना से पूर्व इस देश में पाठ्यक्रमों की कोई सर्वांगीण पद्धति न थी। १८५८ ई० में देश में तीन विश्व- विद्यालय खुले—कलकत्ता, मद्रास और बम्बई के। १८८८ ई० में प्रयाग और लाहौर के दो और विश्वविद्यालय (महर्षि दयानन्द की मृत्यु के बाद) स्थापित हुए। संस्कृत की ऐसी परीक्षायें भी, जैसे काशी की, आरम्भ नहीं हुई थीं। अतः हम निश्चय- पूर्वक कह सकते हैं, कि ऋषि दयानन्द की समग्र पाठ्यक्रम विधि ही इस दिशा में प्रथम प्रयास है। व्याकरणादि पढ़ने के अनन्तर ऋषि ने मनुस्मृति, वाल्मीक रामायण, महाभारत, षड् दर्शन, ब्राह्मण ग्रन्थ, उपवेद (आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद; अर्थवेद- शिल्पादि) सिखाने की बात कही। फिर लिखा कि दो वर्ष में ज्योतिष शास्त्र, सूर्य- सिद्धान्त, जिसमें बीजगणित, अंक, भूगोल, खगोल, और भूगर्भ विद्या हैं, इसको यथावत् सीखें। ज्योतिष विषयों का आदि स्रोत वेद की ऋचाएँ हैं। ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के सूक्त १६४ का नाम अस्यवामीय सूक्त है। इस सूक्त के मन्त्रद्रष्टा ऋषि दीर्घतमस् हैं। यह सूक्त ज्योतिष शास्त्र का प्रेरणादायक स्रोत है— द्वादशारं न हि तज्जराय वर्वति चक्रं परि द्यामृतस्य। आ पुत्रा अग्ने मिथुनासो अत्र सप्तशतानि विंशतिश्च तस्थुः ॥ (ऋ० १/१६४/११) सूर्य का चक्र जिसमें बारह अरे हैं, जो निरन्तर घूमता रहता है, कभी थकता भी नहीं, जीर्ण भी नहीं होता, मरता भी नहीं। ७२० इसके पुत्र हैं (३६० दिन और ३६० रात्रियाँ)। अथर्ववेद में दो सूक्त उन्नीसवें काण्ड में हैं (सूक्त ७ और ८), जिनका ऋषि गार्ग्य है। इस सूक्त में २७ नक्षत्रों का गणना दी गयी है। वेद से प्रेरणा पाकर लगध मुनि ने वेदांग ज्योतिष की रचना की जिसके श्लोक ऋग्- ज्योतिष और यजुः-ज्योतिष् नाम से मिलते हैं। लगध का काल ६०० ईसा से पूर्व माना जाता है। ज्योतिष् के लिए एक और शब्द काल-विधान-शास्त्र (यजुः-ज्योतिष् ३) है। "गणित" शब्द का भी प्रयोग इसी अर्थ में लगध ने किया है, और वेदांग के इस अंग की महिमा इस प्रकार व्यक्त की है—

( ७ ) यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा । तद्वद् वेदाङ्ग शास्त्राणां गणितं मूर्धनि स्थितम् ॥ (यजुः ज्योतिष्, श्लोक ४) मयूर के शरीर में जो शिखा की शोभा है, और साँपों के शिर में मणि की वही महिमा वेदांगों में गणित की अर्थात् गणित-ज्योतिष् की है । वेदांग ज्योतिष के बाद ज्योतिष शास्त्र के क्षेत्र में ज्योतिष के कई सिद्धान्तों का प्रचलन हुआ । इनमें से पाँच सिद्धान्त विशेष महत्व के हैं। इनका तुलनात्मक विवेचन वराहमिहिर ने अपनी प्रसिद्ध रचना “पंचसिद्धान्तिका” में किया है। पांच सिद्धान्त निम्न श्लोक में गिनाये हैं— पौलिश-रोमक-वासिष्ठ-सौर-पैतामहास्तु पंचसिद्धान्तः । इन पांचों में से प्रथम दो का (पौलिश और रोमक का) लाटदेव ने विवेचन किया । वराहमिहिर की दृष्टि से पौलिश सिद्धान्त में गणना यथार्थ है, रोमक-सिद्धान्त भी लगभग ऐसा ही है । इन दोनों से भी अधिक स्पष्ट सावित्र-सिद्धान्त अर्थात् सौर सिद्धान्त या सूर्य-सिद्धान्त है । शेष दो वासिष्ठ और पैतामह झूठे (दुरविभ्रष्ट) हैं। पंचसिद्धान्तिका का एक संस्करण प्रोफेसर थीबोट (G. Thibaut) और महामहोपाध्याय सुधाकर द्विवेदी ने अंग्रेजी अनुवाद सहित प्रकाशित किया । सुधाकर जी के संस्कृत भाष्य का नाम “पंचसिद्धान्तिका प्रकाशिका" है (प्रयाग, १५ दिसम्बर' १८८८) । इसकी परम्परा में ही विज्ञान परिषद, प्रयाग, के पुराने पार्षद श्री महावीर प्रसाद श्रीवास्तव ने सूर्यसिद्धान्त के विज्ञान-भाष्य का दुस्तर कार्य हाथ में लिया । उनके जीवन भर का यह गुरुतर कार्य १९४० ई० में समाप्त हुआ । १९२२ में ग्रन्थ आरंभ हुआ, इसका प्रथम अध्याय (मध्यमाधिकार) १९२४ में प्रकाशित हुआ । बारहवां अध्याय १९३१ में छपा । धनाभाव से फिर काम रुक गया । अन्तिम दो अध्याय १९४० में छपे । इस प्रकार यह भाष्य भ्रातृ द्वितीया संवत् १९९७ वि० अर्थात् सन् १९४० ई० को समाप्त हुआ था । श्रीवास्तव जी का यह ग्रन्थ थोड़ा- थोड़ा करके विज्ञान-मासिक पत्रिका में लगभग प्रतिमास निकलता था, और ग्रन्थ रूप में इसकी कुछ प्रतियाँ अलग से भी तैयार कर दी गयीं । पिछले लगभग २० वर्ष से सूर्य-सिद्धान्त का यह विज्ञान भाष्य अनुपलब्ध रहा है । डा० रत्नकुमारी स्वाध्याय संस्थान को यह गौरव प्राप्त है, कि विज्ञान परिषद्, प्रयाग के अधिकारियों की असीम उदारता से इसके प्रकाशन की अनुमति इस संस्थान को प्राप्त हुई । प्राचीन वाङ्मय के अनमोल ग्रन्थों के प्रकाशन की आयोजना, स्वाध्याय संस्थान ने अपने हाथ में ली है। इस ग्रन्थ को हम दो खण्डों में प्रकाशित कर रहे हैं। ग्रन्थ के अन्तर्गत जो चित्र हैं, उनके ब्लाक विज्ञान-परिषद् ने .

( ८ ) तैयार कराके संस्थान को सौंपे । स्वर्गीय महावीर प्रसाद श्रीवास्तव के पुत्र श्री श्रीकृष्ण श्रीवास्तव, अवकाश प्राप्त जज, ने इस कार्य में रुचि ली । विज्ञान परिषद् के महामंत्री डा० शिवगोपाल मिश्र जी ने समस्त ग्रन्थ का प्रूफ-संशोधन कार्य स्वयं तपस्या-पूर्वक तत्परता से किया । सूर्य-सिद्धान्त का मूल संस्कृत पाठ प्रो० कृपाशंकर शुक्ल, लखनऊ विश्वविद्यालय, के सम्पादित संस्करण के आधार पर दिया गया है । पाठ के संशोधन में हमें यथेष्ट सहायता अपने वयोवृद्ध सदस्य पं० ओंकारनाथ शर्मा जी से भी प्राप्त हुई थी । हम इन सब के आभारी हैं । स्वर्गीय श्री श्रीवास्तव जी ने पुस्तक की एक विस्तृत भूमिका (४३ पृष्ठों की) लिखी थी, जो अन्तिम खण्ड के साथ प्रकाशित हुई थी (१६४०) । खेद है, कि उनकी यह भूमिका वर्तमान संस्करण में पूरी तरह से नहीं दी जा सकी है । इसके कुछ ही आवश्यक अंश हम यहाँ दे रहे हैं । स्व० श्रीवास्तव जी ने विज्ञान परिषद् प्रयाग द्वारा प्रकाशित "सरल विज्ञानसागर" (१६४६) ग्रन्थ में भारतीय ज्योतिष् पर अत्युपयोगी सामग्री दी है । यदि यह अलग से प्रकाशित हो जाय, तो अत्युत्तम होगा । स्वर्गीय श्री महावीर प्रसाद श्रीवास्तव ने यह विज्ञान-भाष्य अपने दिवंगत पूज्य पिता जी को समर्पित किया था । समर्पण के शब्द थे—"पूज्य पिताजी की पुण्य स्मृति में, जिनके चरणों में बैठकर गणित का प्रथम पाठ पढ़ा था ।" —उषा ज्योतिष्मती डॉ० रत्नकुमारी स्वाध्याय संस्थान, अध्यक्ष प्रयाग अनुसंधान विभाग १५ मार्च १६८२

भाष्यकार की भूमिका [ स्व० श्री महावीर प्रसाद श्रीवास्तव द्वारा लिखित भूमिका का संक्षिप्त अंश ] ज्योतिषशास्त्र वेद का प्रधान अंग है क्योंकि इसी से यज्ञों का समय निश्चित किया जाता है। इसलिए प्राचीन काल में भारतवर्ष में ज्योतिषशास्त्र का अध्ययन- अध्यापन पुण्यकार्य समझा जाता था। इसका दूसरा नाम कालविधानशास्त्र अथवा कालज्ञान भी है। कश्यप संहिता के अनुसार ज्योतिषशास्त्र के प्रवर्तक १८ आचार्य थे जिनके नाम यह हैं :— १—सूर्य, २—पितामह, ३—व्यास, ४—वसिष्ठ, ५—अत्रि, ६—पराशर, ७—कश्यप, ८—नारद, ९—गर्ग, १०—मरीचि, ११—मनु, १२—अंगिरा, १३—लोमश, १४—पौलिश, १५—च्यवन, १६—यवन, १७—भृगु और १८— शौनक। यहां जो १८ नाम गिनाये गये हैं उन सब के सिद्धान्त-ग्रन्थों का पता नहीं है। इनमें कई संहिता और सिद्धान्त दोनों के कर्ता हैं, कोई दोनों में केवल एक ही विषय के हैं, किसी के नाम का ग्रन्थ दोनों विषयों पर भी नहीं उपलब्ध है। जिन प्राचीन सिद्धान्तों की चर्चा वराहमिहिर के समय से अब तक होती आयी है वे हैं १—पौलिश, २—रोमक, ३—वासिष्ठ, ४—सौर, और ५—पैतामह सिद्धान्त, जिनका संग्रह वराहमिहिर ने (५५० ई० के लगभग) अपनी पंच-सिद्धांतिका नामक पुस्तक में किया है जिसमें यह भी बतलाया है कि पौलिश सिद्धान्त स्पष्ट है, उसी के निकट रोमक-सिद्धान्त है, परन्तु सबसे स्पष्ट सूर्य-सिद्धान्त है, शेष दो बहुत भ्रष्ट है। पंचसिद्धान्तिका-प्रकाशिका टीका के पृष्ठ २ पर म० म० सुधाकर द्विवेदी जी सूर्यारुण-संवाद का अवतरण देकर कहते हैं कि गर्गादि मुनियों का जो ज्ञान पुलिश महर्षि ने कहा वह पौलिश सिद्धान्त, ब्रह्मशाप के कारण रोमक नगर में उत्पन्न होकर, सूर्य भगवान ने जो ज्ञान रोमक के यवन जाति को बतलाया वह रोमक सिद्धान्त, जिसे वसिष्ट ने अपने पुत्र पराशर को दिया वह वसिष्ट सिद्धान्त, जिसे सूर्य ने मय दैत्य को दिया वह सौर-सिद्धान्त और जिसे ब्रह्मा ने अपने पुत्र वसिष्ठ को दिया वह पैतामह-सिद्धान्त है। यह सूर्यारुण संवाद कहाँ से लिया गया यह नहीं बतलाया गया है। इसके अनुसार रोमक सिद्धान्त और सौर-सिद्धान्त दोनों के उपदेशक सूर्य भगवान् हैं। पहला

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रोमक नगर में यवनों को बतलाया गया और दूसरा मय दैत्य को जिनके स्थान का पता नहीं है परन्तु जिसको पाश्चात्य विद्वान् यूनानी (यवन) तथा भारतीय विद्वान् असीरिया या बेबीलोनिया का निवासी समझते हैं। परन्तु ब्रह्मगुप्त ने (६२८ ई०) केवल रोमक-सिद्धान्त को विदेशी (स्मृति बाह्य) समझा था, सौर-सिद्धान्त को नहीं। वर्तमान सूर्य-सिद्धान्त के पहले अध्याय के श्लोक २-६ में लिखा है कि सतयुग के अंत में मय नामक असुर ने ज्योतिष सीखने के लिए सूर्य भगवान् की तपस्या की, तब उन्होंने अपने अंश पुरुष को इस काम के लिए नियुक्त किया। इसी अंश पुरुष ने सारा सूर्य-सिद्धान्त जिसे पहले के युगों में स्वयं सूर्य भगवान् ने महर्षियों को बतलाया था मयासुर को बतलाया जिससे महर्षियों ने फिर प्राप्त किया । यदि वद की संहिताओं, ब्राह्मण-ग्रन्थों और उपनिषदों का निष्पक्ष भाव से अध्ययन किया जाय तो पता चलेगा कि उस प्रागैतिहासिक काल में भी आकाश- दर्शन के अनुभव जहाँ-तहाँ भरे पड़े हैं और उन पर खूब तर्क-वितर्क किया गया है। यदि ऐसा न होता तो अयन बिन्दु के भिन्न-भिन्न नक्षत्रों में होने की बात कहाँ से आती, ऋतुओं और महीनों तथा तिथियों और नक्षत्रों का सम्बन्ध किस प्रकार जान पाते ! मध्यकालीन भारत में भी बुद्धिमान और सूक्ष्मदर्शी ज्योतिषियों और गणितज्ञों का अभाव नहीं था। आर्यभट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, मुंजाल, केशव, गणेश आदि के ग्रन्थ पढ़नेवाले यह जान सकते हैं कि आकाश की घटनाओं के बारे में इन्होंने कैसी-कैसी सूक्ष्म बातें लिखी हैं। अब तो शंकर बालकृष्ण दीक्षित, प्रबोधचन्द्र सेनगुप्त आदि ने प्राच्य और पाश्चात्य ज्योतिषियों के ग्रन्थों के तुलनात्मक अध्ययन से भी यह सिद्ध कर दिया है कि भारतीय ज्योतिष हिपार्कस या टालमी की ज्योतिष से सर्वथा स्वतंत्र है। आर्यभटीय से स्पष्ट प्रतीत होता है कि आर्यभट ने भारत के प्राचीन ज्योतिष् का मंथन करके तथा सूर्य, चन्द्र, ग्रहों और नक्षत्रों का स्वयं निरीक्षण करके आर्यभटीय ग्रन्थ का निर्माण किया था ।१ जी० आर० के (G. R. Kaye) लिखते हैं, "इसमें संदेह नहीं कि वराह- १ सदसज्ज्ञान समुद्रात् समुद्धृतं देवताप्रसादेन । सञ्ज्ञानोत्तर रत्नं मया निमग्नं स्वमतिनावा ॥४६॥ आर्यभटीयं नाम्नापूर्वं स्वायम्भुवं सदासदत् । सुकृतायुषोः प्रणाशं कुरुते प्रति कञ्चुकं योऽस्यः ॥५०॥ क्षितिरवियोगाद्दिनकृद्रवीन्दुयोगात् प्रसाधितश्चेन्दुः । शशि तारा ग्रह योगात्तथैव ताराग्रहास्सर्वे ॥४८॥ (आर्यभटीय गोलपाद)

( ११ ) मिहिर के पास यवनों के सिद्धान्तग्रंथ मौजूद थे और उनकी व्याख्या के ढंग से यह जान पड़ता है कि वे नये विचार या कम से कम ऐसे विचार और शब्द जो दोनों में सामान्य नहीं थे अपने ग्रंथों में ला रहे थे और यह तो निश्चय है कि इनमें से कुछ विचार टालमी के बाद के हैं।" इस मत का खण्डन करने के लिए मुझे सबसे प्रबल प्रमाण यह जान पड़ता है जिसमें वराहमिहिर ने अयन-चलन या बसंत-सम्पात-चलन की अनभिज्ञता दिखलायी है, यद्यपि उनको इस बात का ज्ञान था कि उनके समय में दक्षिणायन कर्क राशि के आरम्भ में अथवा पुनर्वसु नक्षत्र में होता था और प्राचीन काल में यह अश्लेषा के आधे भाग पर होता था । १ यदि उनको हिपार्कस या टालमी के ग्रंथ से परिचय होता तो इनके लिखे बसन्त-सम्पात-चलन (precession of equinoxes) को अवश्य मान लेते । इस बात पर ब्रह्मगुप्त ने भी नहीं ध्यान दिया था जिससे प्रकट होता है कि ब्रह्मगुप्त के समय तक बसंत-सम्पात-चलन की बात मध्यकालीन भारतीय ज्योतिषियों को नहीं खटकी थी यद्यपि प्राचीन काल में आकाश के प्रत्यक्ष दर्शन से उनको अनुभव हो गया था कि उत्तरायण और दक्षिणायन के नक्षत्र बदल गये हैं क्योंकि मैत्रायिणी उपनिषद में इस बात का उल्लेख है कि दक्षिणायन उस समय होता था जब सूर्य मघा से लेकर धनिष्ठा के आधे भाग तक रहता था और उत्तरायण उस समय होता था जब सूर्य श्रविष्ठार्ध से अश्लेषा तक रहता था । वेदांग ज्योतिष में भी यह साफ़-साफ़ बतलाया गया है कि उत्तरायण का आरम्भ उस समय होता था जब सूर्य श्रविष्ठा के आदि में आता था । वराहमिहिर इसी की चर्चा करते हुए बतलाते हैं कि हमारे समय में दक्षिणायन पुनर्वसु में होता है, जब इससे भिन्न हो तो निरीक्षण करके निश्चय कर लेना चाहिए २ । ऊपर के अंकों से स्पष्ट है कि नाक्षत्र वर्ष के भारतीय मान यथार्थ नाक्षत्र वर्ष से ३ मिनट २७ सेकण्ड से अधिक बड़े नहीं हैं और ब्रह्मगुप्त का मान इसके सबसे निकट है । वास्तव में यह मान मन्द-केन्द्र वर्ष के मान से सवा मिनट के लगभग कम हैं इसलिए इससे प्रायः बिल्कुल मिलते हैं । यही कारण है कि सूर्य के मन्दोच्च की गति हमारे ग्रन्थों में प्रायः नगण्य सी मानी गयी है । इनकी तुलना में मेटन और बेबीलोनिया के नाक्षत्र वर्ष के मानों में अधिक भूल है । टालमी और केपलर के सायन वर्ष के मान यथार्थ सायन वर्ष से साढ़े ६ या ७ मिनट अधिक हैं । इसलिए १. आश्लेषार्द्धादासीद्यदा निवृत्तिः किलोष्णकिरणस्य । युक्तमयनं तदासीत् साम्प्रतमयनं पुनर्वसुतः ।।२१।। २. वाराही संहिता आदित्य चार पृष्ठ १६, १७, विज्ञानभाष्य पृष्ठ ३३६ ।

सौर वर्ष के मान—भिन्न-भिन्न मतों के अनुसार ( १२ ) दिन घंटा मिनट सेकंड वर्तमान सूर्य सिद्धान्त ३६५ ६ १२ ३६.५६ यथार्थ से ३ मिनट २७ सै० अधिक आर्यभटीय ३६५ ६ १२ २६.६४ ,, ३ ,, २० ,, ,, ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त ३६५ ६ १२ ६ ,, ३ मिनट अधिक मध्यमनाक्षत वर्ष लॉकियर के अनुसार ३६५ ६ ९ ६.३ यथार्थ नाक्षत वर्ष चान्द्र-केन्द्र-वर्ष ,, ३६५ ६ १३ ४६.३ सायनवर्ष ,, ३६५ ५ ४८ ४६.०५४ यथार्थ सायन वर्ष से ६ मि० २६ सै० सायनवर्ष तालमी के अनुसार* ३६५ ५ ५५ १२ अधिक ,, कोपरनिकस के अनुसार × ३६५ ५ ५५ ५८ ,, ,, ७ ,, ६ ,, नाक्षतवर्ष मेटन के अनुसार† ३६५ ६ १८ ५७ यथार्थ नाक्षत वर्ष से ६ ,, ४८ ,, ,, बेबीलोनियन§ ३६५ ६ १३ ३६.३ ,, ,, ४ ,, ३० ,,

  • Syntaxis, Karl Manitius's edition, Vol. I, p. 146. × Heroes of Science, p. 63 § Encyclopaedia Britannica, History of Astronomy.

( १३ ) सिद्ध है कि हमारे ज्योतिषियों के बेध टालमी वा केपलर के बेधों की अपेक्षा अधिक शुद्ध हैं और इसलिए स्वतन्त्र भी हैं। इसी प्रकार यदि मन्दोच्चों, पातों तथा अन्य ध्रुवांकों की तुलना की जाय तो प्रगट हो जाता है कि हमारे आचार्यों के माने हुए ध्रुवांक अधिकांश में यथार्थ से अधिक निकट हैं। इसलिए यह सिद्ध हो जाता है कि हमारा ज्योतिष टालमी या किसी अन्य विदेशी ज्योतिष की छाया नहीं है वरन् स्वतन्त्र है। इन बातों का दिग्दर्शन विज्ञान-भाष्य में जगह-जगह कराया गया है। सूर्य-सिद्धान्त का रचना काल—इस सम्बन्ध में विद्वानों में बड़ा मतभेद है। इस पुस्तक में जो रचना काल बतलाया गया है वह तर्क से तो समझ में आता नहीं क्योंकि यदि यह इतने प्राचीनकाल, इक्कीस लाख पैंसठ हजार वर्ष से इसी प्रकार चला आता तो आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व महाभारत-काल में उस समय के महाराजाधिराज दुर्योधन के दरबार में जहाँ उस समय के बड़े-बड़े विद्वान मौजूद थे यह प्रश्न क्यों उठ खड़ा होता कि पाण्डवों के चौदह वर्ष का बनवास-काल कब पूरा होगा ? इस सम्बन्ध में भीष्म का जो उत्तर है उससे तो यह समझ में नहीं आता कि उस समय सूर्य-सिद्धान्त जैसे ग्रन्थ की ज्योतिष-गणना का उनको परिचय था। परन्तु इसमें संदेह नहीं कि इस ग्रन्थ का आदि रूप वराहमिहिर के बहुत पहले का है और संभव है कि पंचसिद्धान्तिका में जो रूप देख पड़ता है वह आदि रूप नहीं है वरन् उसमें वराहमिहिर ने कुछ संशोधन किया है। परन्तु आश्चर्य है कि आर्यभट्ट (४७६ ई०) ने अपने ग्रन्थ इसकी कहीं चर्चा नहीं की है, इससे यह अनुमान होता है कि आर्यभटीय के रचना काल के आसपास ही इसकी रचना भी हुई है। वराह- मिहिर ने सूर्य-सिद्धान्त का जो रूप दिया है वह वर्तमान सूर्य-सिद्धान्त से भिन्न है जिसमें अयन-चलन की बातें पीछे से बढ़ायी गयी हैं क्योंकि यदि अयन-चलन की चर्चा सूर्य-सिद्धान्त में वराहमिहिर के पहले होती तो यह पञ्चसिद्धान्तिका में कहीं न कहीं इसका समावेश जरूर करते और इतना ही लिखकर न संतोष करते कि प्राचीनकाल में अयन-बिन्दु आश्लेषा नक्षत्र में था अब पुनर्वसु में है। ब्रह्मगुप्त (६२८-६६५ ई०) के समय में भी सूर्य-सिद्धान्त का जो रूप था उसमें अयन-चलन की बात नहीं थी क्योंकि ऐसी दशा में ब्रह्मगुप्त इसकी चर्चा अवश्य करते। यह बात तो भास्कराचार्य के कुछ पहले मिलायी गयी होगी परन्तु फिर भी उस रूप में नहीं जैसा कि अब देख पड़ती है क्योंकि भास्कराचार्य ने स्वयं इसकी शुद्धता पर शंका प्रकट की है। इसलिये यह सिद्ध है कि वर्तमान सूर्य-सिद्धान्त का आदि-रूप तो वही है जो पश्च सिद्धान्तिका में दिया गया है और वराहमिहिर के पहले भी मौजूद था अथवा वाराही सूर्य-सिद्धान्त उसका संशोधित रूप है और बाद में भी उसमें ज्योतिषियों ने समय-समय पर संस्कार

( १४ )

ग्रहकलियुग के आरंभ में ३१०२ ई० पूर्वकलि संवत १००० में २१०२ ई० पूर्वकलि संवत २००० में ११०२ ई० पूर्वकलि संवत ३००० में १०२ ई० पूर्वकलि संवत ३६३६ में ५३८ ई०कलि संवत ४१०२ में १०६१ ई०ठीक कब था ईस्वी
अंश कला विकलाअंश कला विकलाअंश कला विकलाअंश कला विकलाअंश कला विकलाअंश कला विकला
बुध+ ३३ २५ ३५+ २५ ६ ५२+ १६ ५४ ६+ ८ ३८ २६+ ३ २१ ४०- १ १२ २८६४५
शुक्र+ ३२ ४२ ३६- २४ ३७ ३१- १६ ३१ २६- ८ २५ २१- ३ १४ ५५+ १ १४ ३६३६
मंगल+ १२ ५ ४२+ ६ २६ ३२+ ६ ४७ २२+ ४ ८ १३+ २ २६ ३०+ ० ५८ २६१४५८
गुरु- १७ २ ५३- १२ ४४ १६- ८ २५ ३६- ४ ७ २- १ २१ ४७+ ० ४१ १४६०६
शनि+ २० ५६ ३+ १५ ४३ २०+ १० २७ ३७- ५ ११ ५४+ १ ५० १०- १ ४ २५८८७
चन्द्र- ५ ५२ ४१- ३ ५० ४८- २ ६ १७- ० ५२ ३२- ० १८ ३०- ० ० ०१११०६७
चन्द्रोच्च- ३० ११ २५- २३ ६ ३६- १६ ७ ४७- ६ ५ ५८- ४ ३६ २६- ० ४३ १०-१६३
चन्द्र-पात+ २३ ३७ ३१+ १७ ५६ २१+ १२ ३१ ११+ ७ ३ १+ ३ ३३ १६+ ० ३१ ५०१२८८
मध्यम मान १०६१

करके इसको वर्तमान रूप में प्रकट किया है, जिसके लिये आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त आदि के ग्रन्थों या वेधों से सहायता ली गयी होगी, जैसा कि सेनगुप्त महोदय अपनी खण्डखाद्यक की भूमिका में सिद्ध करते हैं। पाश्चात्य विद्वानों का मत — इसके रचना काल के सम्बन्ध में पाश्चात्य विद्वानों ने बड़ा ऊहा-पोह किया है जिसके लिये उनको धन्यवाद देना हमारा परम कर्त्तव्य है। इस विषय में बेंटली महोदय ने बहुत परिश्रम किया है। इन्होंने सूर्य- चन्द्रमा आदि ग्रहों की गणना सूर्य-सिद्धान्त तथा नवीन वेधों के अनुसार भिन्न-भिन्न कालों के लिये करके उस समय को सूर्य-सिद्धान्त का रचनाकाल स्थिर किया है जब दोनों गणनाओं के अनुसार ग्रहों के भोगांश एक हो जाते हैं। यह बात पृष्ठ १४ के कोष्ठक से स्पष्ट होगी जिसमें ग्रहों की अशुद्धियां दिखलाई गयी हैं। इससे बेंटली यह परिणाम निकालते हैं कि सूर्य-सिद्धान्त ११वीं सदी के अन्तिम चरण में लिखा गया । देखने में तो यह बहुत ही युक्ति-युक्त जान पड़ता है और इसमें संदेह नहीं कि लेखक महोदय ने इसमें बड़ी नवीनता दिखलाई है परन्तु यथार्थ में यह रीति बिना अच्छी तरह परीक्षा किये मानने योग्य नहीं है। यह बात मैं बर्जेस के अनुवाद की प्रकाशन समिति के शब्दों में ही बतला देना पर्याप्त समझता हूं :— "दूसरे ग्रहों के सम्बन्ध में बेंटली ने शून्य अशुद्धि के जो समय निकाले हैं वे हमारे निकाले हुए समयों से बहुत मिलते हैं जिनको हमने १८६० ई० की अशुद्धियों से पीछे की तरफ गणना कर के निकाले हैं और जो ६७वें श्लोक की टीका के साथ दिये गये हैं।" "इन दोनों कोष्ठकों की तुलना करने पर यह तुरन्त देख पड़ेगा कि बेंटली ने अपना निर्णय ग्रहों के निरपेक्ष स्थानों की अशुद्धियों से नहीं निकाला है वरन् सूर्य के स्थान की तुलना में। परन्तु सूर्य के स्थान की अशुद्धि का उन्होंने विचार ही नहीं किया है। हिंदुओं का राशि-चक्र नाक्षत्रिक (Sidereal) है और सूर्य की गति पर किसी प्रकार निर्भर नहीं है। अन्य ग्रहों की तरह सूर्य भी ३१०२ ई० पूर्व उस स्थान पर नहीं था, जहाँ मान लिया गया है और इसलिये इस पद्धति के अनुसार सूर्य की जो गति मानी गयी है वह यथार्थ से भिन्न है क्योंकि नाक्षत्रवर्ष ३॥ मिनट बड़ा माना गया है। इसलिये सूर्य की अशुद्धि का विचार क्यों न किया जाय और ग्रहों की नाक्षत्रिक गति का विचार इसी अशुद्ध गति की तुलना में क्यों किया जाय ? यह प्रकट है कि बेंटली को सूर्य के स्थान का भी पूरी तरह विचार करना चाहिए था और यह दिखलाना चाहिए था कि इससे भी वही परिणाम निकलता है जैसा कि अन्य ग्रहों की गणना से और यदि नहीं तो असंगति का कारण क्या था ? ऐसा

पहली जनवरी सन् १८६० ई० को वाशिंगटन की मध्यरात्रि में ग्रहों के मध्यम भोगांश ( १६ )

\t\t\t\tसूर्य-सिद्धान्तानुसार\t\t\t\tअर्वाचीन ज्योतिषानुसार ग्रह\t\t\tमूल\t\t\tबीज संस्कृत \tअंश\tकला\tविकला\tअंश\tकला\tविकला\tअंश\tकला\tविकला

सूर्य\t६६\t१८\t२१\t६६\t१८\t२१\t१००\t५\t६ बुध\t१५५\t२\t३०\t१४८\t२५\t३६\t१५१\t२८\t२० शुक्र\t३३६\t५४\t५५\t३३४\t५७\t१८\t३६६\t१३\t३६ मंगल\t१६२\t३६\t५\t१६२\t३६\t५\t१६७\t२६\t३२ गुरु\t१०४\t७\t२२\t१००\t४८\t५६\t१०३\t३५\t१७ शनि\t१२८\t१७\t११\t१३३\t१४\t४६\t१३७\t१०\t१० चन्द्रमा\t६\t४\t६\t६\t४\t६\t१२\t४१\t२३ चन्द्रोच्च\t३२७\t५०\t२४\t३२६\t११\t११\t३२६\t४७\t३५ चन्द्रपात\t३१२\t२६\t५१\t३१०\t५०\t३८\t३१२\t४८\t१०

( १७ ) सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार निकाले हुए ग्रहों के मध्यम भोगांशों की अशुद्धियाँ | मूल ग्रन्थ के अनुसार अशुद्धियाँ | | | | बीज संस्कृत ग्रन्थ के अनुसार अशुद्धियाँ | | | | | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | | ग्रह | *निरपेक्ष<br>अंश कला विकला | कब शुद्ध<br>ई० | सूर्य की अपेक्षा<br>अंश कला विकला | कब शुद्ध<br>ई० | निरपेक्ष<br>अंश कला विकला | कब शुद्ध<br>ई० | सापेक्ष<br>अंश कला विकला | कब शुद्ध<br>ई० | | सूर्य | — ३ ४६ ४५ | २५० | ० ० ० | ...... | — ३ ४६ ४५ | २५० | ० ० ० | ...... | | बुध | + २ ३४ १० | २३३२ | + ७ २० ५५ | ३२७१ | — ३ २ ४१ | १५१७ | + ० ४४ ५ | १६७० | | शुक्र | + ३ ४१ १६ | १२२२ | + ७ २८ ४ | ६४१ | — १ १६ १८ | २१२६ | + २ ३० २७ | १५०६ | | मंगल | — ४ ५० २७ | ८८६ | — १ ३ ४२ | १४५५ | — ४ ५० २७ | ८८६ | — १ ३ ४२ | १४५५ | | गुरु | + ० ३२ ५ | १५७१ | + ४ १८ ५० | ८३२ | — २ ४६ २१ | ४२०३ | + १ ० २४ | १५७५ | | शनि | — ८ ५२ ५६ | ६६६ | — ५ ६ १४ | ८५७ | — ३ ५५ २१ | १२५० | — ० ८ ३६ | १८२५ | | चन्द्रमा | — ३ ३७ १४ | ११५ | + ० ६ ३१ | १०६७ | — ३ ३७ १४ | ११५ | + ० ६ ३१ | १०६७ | | चन्द्रोच्च | + १ २ ४६ | १६७६ | + ४ ४६ ३४ | १२५२ | — ० ३६ २४ | १६६६ | + ३ १० २१ | १४५६ | | चन्द्रपात | — ० १८ १६ | १६७६ | + ३ २८ २६ | ११६२ | — १ ५७ ३२ | २७१४ | + १ ४६ १३ | १४६८ | *निरपेक्ष स्थान वह है जो राशि-चक्र के स्थिर आदि बिन्दु से नापा जाता है और सापेक्ष वह स्थान है जो सूर्य से नापा जाता है जिसकी स्थिति सौर नाक्षत वर्ष के अनुसार निश्चय की जाती है जो यथार्थ से ३ मिनट के लगभग बड़ा है, इसलिये सूर्य का स्थान भी इसी के अनुसार बदल रहा है ।

( १७ ) न करके हमारी समझ में सारी गणना का बहुत ही महत्त्वपूर्ण अंश छोड़ दिया गया है जिससे बहुत ही महत्वपूर्ण परिणाम निकलता है।"...... “लेकिन हमारे सिद्धान्त के बारे में यथार्थ बात क्या है ? हमें यह मिलता है कि इसमें ग्रहों के ऐसे ध्रुवाङ्क दिये गये हैं जिनके स्थानों की भूलों की परीक्षा ऊपर बतलायी हुई रीति से करने पर जान पड़ता है कि इन ध्रुवाङ्कों का निश्चय इस विचार से नहीं किया गया है कि किसी निर्दिष्ट काल में इनकी यथार्थ नाक्षत्रिक स्थिति जानी जा सके । बल्कि इसके प्रतिकूल ये ऐसी गवाही देते हैं कि ईसा की १० वीं या ११वीं सदी में इस बात का प्रयत्न किया गया है कि ग्रहों की स्थिति सूर्य की स्थिति की तुलना में ठीक-ठीक जानी जा सके । इसका भी ठीक-ठीक समय संदेहात्मक है क्योंकि उन समयों में बड़ी भिन्नता है, जिनमें अशुद्धि शून्य समझी जाती है । संस्कृत साहित्य के इतिहास में यह बात उतनी ही ध्रुव है जितनी कोई बात हो सकती है कि उस समय से बहुत पहले सूर्य-सिद्धान्त का अस्तित्व था । अन्य ज्योतिष के ग्रन्थों के निर्देशों और उद्धरणों से इस बात का भी पता चलता है कि इस नाम के ग्रन्थ के कई पाठान्तर भी थे और हम ऊपर (श्लोक ६ में) यह देख भी चुके हैं जो बहुत अस्पष्ट सूचना नहीं है कि वर्तमान ग्रन्थ में ठीक-ठीक वही ध्रुवाङ्क नहीं दिये गये हैं जो पहले सूर्य-सिद्धान्त के माने गये थे । इसलिए इस अनुमान के निकट और क्या हो सकता है कि १०वीं या ११वीं शताब्दी में संशोधन के लिये बीज की जो गणना की गयी थी यह मूल में केवल चार या पाँच श्लोकों को बदल कर खपा दी गयी । इसलिये जबकि दूसरे ग्रहों की तुलनात्मक अशुद्धियां उस समय का निर्देश करती हैं जब यह बीज संस्कार किया गया था, सूर्य की निरपेक्ष अशुद्धि मूल पुस्तक का प्रायः सच्चा समय प्रकट करती है।" “हमारे कोष्ठक में सूर्य की शून्य अशुद्धि का समय २५० ई० है । इस तारीख की अशुद्धता के लिये बहुत जोर देने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि यह उस वेध की शुद्धता पर निर्भर है जिससे सूर्य का स्थान पहले-पहल निश्चय किया गया और फिर उस विन्दु से निर्देश किया गया जिसको आकाश चक्र का आदि विन्दु कहते हैं । कोरी आंख से इसका वेध करना असंभव था कि सूर्य का केन्द्र मध्यम गति के अनुसार रेवती के योग तारा Zeta Piscium के दस कला पूर्व कब था और यह तो स्पष्ट है कि हिन्दुओं ने इस विन्दु से राशिचक्र के अन्य विन्दुओं का जो निश्चय किया है उनमें बड़ी-बड़ी भूलें हैं और यदि सूर्य के स्थान के निश्चय करने में एक अंश की भी भूल हो जाय तो इससे शून्य अशुद्धि के काल में ४२५ वर्ष का अन्तर पड़ सकता है ।

( १६ ) ब्रह्मगुप्त आदि के दिये हुए योग तारों के ध्रुवांकों ( Polar longitude ) की तुलना से भी सूर्य-सिद्धान्त का समय इसीके आस-पास आता है। इनमें कुछ ध्रुवांक परम्परा प्राप्त हैं । ये वह हैं जो तीनों ग्रन्थों में अभिन्न हैं, कुछ को ग्रन्थ- कर्त्ताओं ने स्वयं शुद्ध कर दिया है। इनके तुलनात्मक अध्ययन से हम सूर्य-सिद्धान्त काल की परा और अपरा सीमा ( Superior and inferior limit ) जान सकते हैं । वराह की पञ्चसिद्धान्तिका में भी ( थीबो के अनुसार ) सात योग तारों के ध्रुवांक दिये गये हैं जिनको हम उस प्राचीन सूर्य-सिद्धान्त के ध्रुवांक मानते हैं जो वराह के पहले मौजूद था (देखो पृष्ठ २०-२१)।* प्राचीन सूर्य-सिद्धान्त के समय निरूपण के लिये नीचे लिखे नक्षत्र चुने जाते हैं जिनके ब्रह्मगुप्त के ध्रुवांक सूर्य-सिद्धान्त के ध्रुवांक से जितने अधिक हैं वह सामने लिखे जाते हैं :- अंश कला कृत्तिका ४ ४८ रोहिणी १ २८ पुनर्वसु ५ ३ मघा ३ ० पू० फाल्गुनी ३ ० चित्रा ३ ० योग २० १६ मध्यममान ३ २३ इन छः तारों के ध्रुवांकों की अधिकता का मध्यममान ३ अंश २३ कला के समान है । यदि अयन चलन के कारण ध्रुवांकों की एक अंश की वृद्धि ७२ वर्ष में मानी जाय, तो यह वृद्धि लगभग २४४ वर्ष के समय में हुई होगी । परन्तु ब्रह्मगुप्त का समय हमें निश्चयपूर्वक मालूम है कि ६२८ ई० है । इसलिए सूर्य-सिद्धान्त का समय इससे २४४ वर्ष पूर्व अथवा ३८४ ईस्वी आता है। इसको स्थूल रूप से ४०० ई० समझा जा सकता है। जो इस समय की परा सीमा (Upper limit) है। अपरा सीमा की खोज करने के लिए हमें नीचे लिखे तारों के ध्रुवकों को देखना चाहिए जिनके ध्रुवांक ब्रह्मगुप्त के ध्रुवकों से जितने अधिक हैं उनका मध्यममान १ अंश १५ *बर्जेस के सूर्य-सिद्धान्त के अनुवाद के दूसरे संस्करण की पी० सी० सेनगुप्त की लिखी भूमिका पृष्ठ XXVI-XXIX

( २० ) योग तारों के ध्रुवक (Polar Longitude)

तारा | पंच सिद्धान्तिका | ब्राह्मस्फुट सिद्धान्त | शिष्यधीवृद्धि | वर्तमान सूर्य-सिद्धान्त | वर्तमान सूर्य सिद्धान्त के ध्रुवक कहाँ से लिये गये | अंश कला | अंश कला | अंश कला | अंश कला |

अश्विनी | ... | ८ ० | ८ ३ | ८ ३ | परम्पराप्राप्त भरणी | ... | २० ० | २० ० | २० ० | " कृत्तिका | ३२ ४० | ३७ २८ | ३६ ० | ३७ ३० | ब्रह्मगुप्त रोहिणी | ४८ ० | ४६ २८ | ४६ ० | ४६ ३० | " मृगशिरा | ... | ६२ ० | ६२ ० | ६२ ० | " आर्द्रा | ... | ६७ ० | ७० ० | ६७ २० | नया ? पुनर्वसु | ८८ ० | ९३ ३ | ९२ ० | ९३ ० | ब्रह्मगुप्त पुष्य | ९७ २० | १०६ ० | १०५ २० | १०६ ० | " अश्लेषा | १०७ ४० | १०८ ० | ११४ ० | १०६ ० | नूतन मघा | १२६ ० | १२६ ० | १२८ ० | १२६ ० | ब्रह्मगुप्त पू० फाल्गुनी | ... | १४७ ० | १३६ २० | १४४ ० | परम्पराप्राप्त उ० फाल्गुनी | ... | १५५ ० | १५४ ० | १५५ ० | ब्रह्मगुप्त