सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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रोमक नगर में यवनों को बतलाया गया और दूसरा मय दैत्य को जिनके स्थान का पता नहीं है परन्तु जिसको पाश्चात्य विद्वान् यूनानी (यवन) तथा भारतीय विद्वान् असीरिया या बेबीलोनिया का निवासी समझते हैं। परन्तु ब्रह्मगुप्त ने (६२८ ई०) केवल रोमक-सिद्धान्त को विदेशी (स्मृति बाह्य) समझा था, सौर-सिद्धान्त को नहीं। वर्तमान सूर्य-सिद्धान्त के पहले अध्याय के श्लोक २-६ में लिखा है कि सतयुग के अंत में मय नामक असुर ने ज्योतिष सीखने के लिए सूर्य भगवान् की तपस्या की, तब उन्होंने अपने अंश पुरुष को इस काम के लिए नियुक्त किया। इसी अंश पुरुष ने सारा सूर्य-सिद्धान्त जिसे पहले के युगों में स्वयं सूर्य भगवान् ने महर्षियों को बतलाया था मयासुर को बतलाया जिससे महर्षियों ने फिर प्राप्त किया । यदि वद की संहिताओं, ब्राह्मण-ग्रन्थों और उपनिषदों का निष्पक्ष भाव से अध्ययन किया जाय तो पता चलेगा कि उस प्रागैतिहासिक काल में भी आकाश- दर्शन के अनुभव जहाँ-तहाँ भरे पड़े हैं और उन पर खूब तर्क-वितर्क किया गया है। यदि ऐसा न होता तो अयन बिन्दु के भिन्न-भिन्न नक्षत्रों में होने की बात कहाँ से आती, ऋतुओं और महीनों तथा तिथियों और नक्षत्रों का सम्बन्ध किस प्रकार जान पाते ! मध्यकालीन भारत में भी बुद्धिमान और सूक्ष्मदर्शी ज्योतिषियों और गणितज्ञों का अभाव नहीं था। आर्यभट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, मुंजाल, केशव, गणेश आदि के ग्रन्थ पढ़नेवाले यह जान सकते हैं कि आकाश की घटनाओं के बारे में इन्होंने कैसी-कैसी सूक्ष्म बातें लिखी हैं। अब तो शंकर बालकृष्ण दीक्षित, प्रबोधचन्द्र सेनगुप्त आदि ने प्राच्य और पाश्चात्य ज्योतिषियों के ग्रन्थों के तुलनात्मक अध्ययन से भी यह सिद्ध कर दिया है कि भारतीय ज्योतिष हिपार्कस या टालमी की ज्योतिष से सर्वथा स्वतंत्र है। आर्यभटीय से स्पष्ट प्रतीत होता है कि आर्यभट ने भारत के प्राचीन ज्योतिष् का मंथन करके तथा सूर्य, चन्द्र, ग्रहों और नक्षत्रों का स्वयं निरीक्षण करके आर्यभटीय ग्रन्थ का निर्माण किया था ।१ जी० आर० के (G. R. Kaye) लिखते हैं, "इसमें संदेह नहीं कि वराह- १ सदसज्ज्ञान समुद्रात् समुद्धृतं देवताप्रसादेन । सञ्ज्ञानोत्तर रत्नं मया निमग्नं स्वमतिनावा ॥४६॥ आर्यभटीयं नाम्नापूर्वं स्वायम्भुवं सदासदत् । सुकृतायुषोः प्रणाशं कुरुते प्रति कञ्चुकं योऽस्यः ॥५०॥ क्षितिरवियोगाद्दिनकृद्रवीन्दुयोगात् प्रसाधितश्चेन्दुः । शशि तारा ग्रह योगात्तथैव ताराग्रहास्सर्वे ॥४८॥ (आर्यभटीय गोलपाद)