भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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( ११ ) मिहिर के पास यवनों के सिद्धान्तग्रंथ मौजूद थे और उनकी व्याख्या के ढंग से यह जान पड़ता है कि वे नये विचार या कम से कम ऐसे विचार और शब्द जो दोनों में सामान्य नहीं थे अपने ग्रंथों में ला रहे थे और यह तो निश्चय है कि इनमें से कुछ विचार टालमी के बाद के हैं।" इस मत का खण्डन करने के लिए मुझे सबसे प्रबल प्रमाण यह जान पड़ता है जिसमें वराहमिहिर ने अयन-चलन या बसंत-सम्पात-चलन की अनभिज्ञता दिखलायी है, यद्यपि उनको इस बात का ज्ञान था कि उनके समय में दक्षिणायन कर्क राशि के आरम्भ में अथवा पुनर्वसु नक्षत्र में होता था और प्राचीन काल में यह अश्लेषा के आधे भाग पर होता था । १ यदि उनको हिपार्कस या टालमी के ग्रंथ से परिचय होता तो इनके लिखे बसन्त-सम्पात-चलन (precession of equinoxes) को अवश्य मान लेते । इस बात पर ब्रह्मगुप्त ने भी नहीं ध्यान दिया था जिससे प्रकट होता है कि ब्रह्मगुप्त के समय तक बसंत-सम्पात-चलन की बात मध्यकालीन भारतीय ज्योतिषियों को नहीं खटकी थी यद्यपि प्राचीन काल में आकाश के प्रत्यक्ष दर्शन से उनको अनुभव हो गया था कि उत्तरायण और दक्षिणायन के नक्षत्र बदल गये हैं क्योंकि मैत्रायिणी उपनिषद में इस बात का उल्लेख है कि दक्षिणायन उस समय होता था जब सूर्य मघा से लेकर धनिष्ठा के आधे भाग तक रहता था और उत्तरायण उस समय होता था जब सूर्य श्रविष्ठार्ध से अश्लेषा तक रहता था । वेदांग ज्योतिष में भी यह साफ़-साफ़ बतलाया गया है कि उत्तरायण का आरम्भ उस समय होता था जब सूर्य श्रविष्ठा के आदि में आता था । वराहमिहिर इसी की चर्चा करते हुए बतलाते हैं कि हमारे समय में दक्षिणायन पुनर्वसु में होता है, जब इससे भिन्न हो तो निरीक्षण करके निश्चय कर लेना चाहिए २ । ऊपर के अंकों से स्पष्ट है कि नाक्षत्र वर्ष के भारतीय मान यथार्थ नाक्षत्र वर्ष से ३ मिनट २७ सेकण्ड से अधिक बड़े नहीं हैं और ब्रह्मगुप्त का मान इसके सबसे निकट है । वास्तव में यह मान मन्द-केन्द्र वर्ष के मान से सवा मिनट के लगभग कम हैं इसलिए इससे प्रायः बिल्कुल मिलते हैं । यही कारण है कि सूर्य के मन्दोच्च की गति हमारे ग्रन्थों में प्रायः नगण्य सी मानी गयी है । इनकी तुलना में मेटन और बेबीलोनिया के नाक्षत्र वर्ष के मानों में अधिक भूल है । टालमी और केपलर के सायन वर्ष के मान यथार्थ सायन वर्ष से साढ़े ६ या ७ मिनट अधिक हैं । इसलिए १. आश्लेषार्द्धादासीद्यदा निवृत्तिः किलोष्णकिरणस्य । युक्तमयनं तदासीत् साम्प्रतमयनं पुनर्वसुतः ।।२१।। २. वाराही संहिता आदित्य चार पृष्ठ १६, १७, विज्ञानभाष्य पृष्ठ ३३६ ।