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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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( १६ ) ब्रह्मगुप्त आदि के दिये हुए योग तारों के ध्रुवांकों ( Polar longitude ) की तुलना से भी सूर्य-सिद्धान्त का समय इसीके आस-पास आता है। इनमें कुछ ध्रुवांक परम्परा प्राप्त हैं । ये वह हैं जो तीनों ग्रन्थों में अभिन्न हैं, कुछ को ग्रन्थ- कर्त्ताओं ने स्वयं शुद्ध कर दिया है। इनके तुलनात्मक अध्ययन से हम सूर्य-सिद्धान्त काल की परा और अपरा सीमा ( Superior and inferior limit ) जान सकते हैं । वराह की पञ्चसिद्धान्तिका में भी ( थीबो के अनुसार ) सात योग तारों के ध्रुवांक दिये गये हैं जिनको हम उस प्राचीन सूर्य-सिद्धान्त के ध्रुवांक मानते हैं जो वराह के पहले मौजूद था (देखो पृष्ठ २०-२१)।* प्राचीन सूर्य-सिद्धान्त के समय निरूपण के लिये नीचे लिखे नक्षत्र चुने जाते हैं जिनके ब्रह्मगुप्त के ध्रुवांक सूर्य-सिद्धान्त के ध्रुवांक से जितने अधिक हैं वह सामने लिखे जाते हैं :- अंश कला कृत्तिका ४ ४८ रोहिणी १ २८ पुनर्वसु ५ ३ मघा ३ ० पू० फाल्गुनी ३ ० चित्रा ३ ० योग २० १६ मध्यममान ३ २३ इन छः तारों के ध्रुवांकों की अधिकता का मध्यममान ३ अंश २३ कला के समान है । यदि अयन चलन के कारण ध्रुवांकों की एक अंश की वृद्धि ७२ वर्ष में मानी जाय, तो यह वृद्धि लगभग २४४ वर्ष के समय में हुई होगी । परन्तु ब्रह्मगुप्त का समय हमें निश्चयपूर्वक मालूम है कि ६२८ ई० है । इसलिए सूर्य-सिद्धान्त का समय इससे २४४ वर्ष पूर्व अथवा ३८४ ईस्वी आता है। इसको स्थूल रूप से ४०० ई० समझा जा सकता है। जो इस समय की परा सीमा (Upper limit) है। अपरा सीमा की खोज करने के लिए हमें नीचे लिखे तारों के ध्रुवकों को देखना चाहिए जिनके ध्रुवांक ब्रह्मगुप्त के ध्रुवकों से जितने अधिक हैं उनका मध्यममान १ अंश १५ *बर्जेस के सूर्य-सिद्धान्त के अनुवाद के दूसरे संस्करण की पी० सी० सेनगुप्त की लिखी भूमिका पृष्ठ XXVI-XXIX