भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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( १७ ) न करके हमारी समझ में सारी गणना का बहुत ही महत्त्वपूर्ण अंश छोड़ दिया गया है जिससे बहुत ही महत्वपूर्ण परिणाम निकलता है।"...... “लेकिन हमारे सिद्धान्त के बारे में यथार्थ बात क्या है ? हमें यह मिलता है कि इसमें ग्रहों के ऐसे ध्रुवाङ्क दिये गये हैं जिनके स्थानों की भूलों की परीक्षा ऊपर बतलायी हुई रीति से करने पर जान पड़ता है कि इन ध्रुवाङ्कों का निश्चय इस विचार से नहीं किया गया है कि किसी निर्दिष्ट काल में इनकी यथार्थ नाक्षत्रिक स्थिति जानी जा सके । बल्कि इसके प्रतिकूल ये ऐसी गवाही देते हैं कि ईसा की १० वीं या ११वीं सदी में इस बात का प्रयत्न किया गया है कि ग्रहों की स्थिति सूर्य की स्थिति की तुलना में ठीक-ठीक जानी जा सके । इसका भी ठीक-ठीक समय संदेहात्मक है क्योंकि उन समयों में बड़ी भिन्नता है, जिनमें अशुद्धि शून्य समझी जाती है । संस्कृत साहित्य के इतिहास में यह बात उतनी ही ध्रुव है जितनी कोई बात हो सकती है कि उस समय से बहुत पहले सूर्य-सिद्धान्त का अस्तित्व था । अन्य ज्योतिष के ग्रन्थों के निर्देशों और उद्धरणों से इस बात का भी पता चलता है कि इस नाम के ग्रन्थ के कई पाठान्तर भी थे और हम ऊपर (श्लोक ६ में) यह देख भी चुके हैं जो बहुत अस्पष्ट सूचना नहीं है कि वर्तमान ग्रन्थ में ठीक-ठीक वही ध्रुवाङ्क नहीं दिये गये हैं जो पहले सूर्य-सिद्धान्त के माने गये थे । इसलिए इस अनुमान के निकट और क्या हो सकता है कि १०वीं या ११वीं शताब्दी में संशोधन के लिये बीज की जो गणना की गयी थी यह मूल में केवल चार या पाँच श्लोकों को बदल कर खपा दी गयी । इसलिये जबकि दूसरे ग्रहों की तुलनात्मक अशुद्धियां उस समय का निर्देश करती हैं जब यह बीज संस्कार किया गया था, सूर्य की निरपेक्ष अशुद्धि मूल पुस्तक का प्रायः सच्चा समय प्रकट करती है।" “हमारे कोष्ठक में सूर्य की शून्य अशुद्धि का समय २५० ई० है । इस तारीख की अशुद्धता के लिये बहुत जोर देने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि यह उस वेध की शुद्धता पर निर्भर है जिससे सूर्य का स्थान पहले-पहल निश्चय किया गया और फिर उस विन्दु से निर्देश किया गया जिसको आकाश चक्र का आदि विन्दु कहते हैं । कोरी आंख से इसका वेध करना असंभव था कि सूर्य का केन्द्र मध्यम गति के अनुसार रेवती के योग तारा Zeta Piscium के दस कला पूर्व कब था और यह तो स्पष्ट है कि हिन्दुओं ने इस विन्दु से राशिचक्र के अन्य विन्दुओं का जो निश्चय किया है उनमें बड़ी-बड़ी भूलें हैं और यदि सूर्य के स्थान के निश्चय करने में एक अंश की भी भूल हो जाय तो इससे शून्य अशुद्धि के काल में ४२५ वर्ष का अन्तर पड़ सकता है ।