सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७ ) यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा । तद्वद् वेदाङ्ग शास्त्राणां गणितं मूर्धनि स्थितम् ॥ (यजुः ज्योतिष्, श्लोक ४) मयूर के शरीर में जो शिखा की शोभा है, और साँपों के शिर में मणि की वही महिमा वेदांगों में गणित की अर्थात् गणित-ज्योतिष् की है । वेदांग ज्योतिष के बाद ज्योतिष शास्त्र के क्षेत्र में ज्योतिष के कई सिद्धान्तों का प्रचलन हुआ । इनमें से पाँच सिद्धान्त विशेष महत्व के हैं। इनका तुलनात्मक विवेचन वराहमिहिर ने अपनी प्रसिद्ध रचना “पंचसिद्धान्तिका” में किया है। पांच सिद्धान्त निम्न श्लोक में गिनाये हैं— पौलिश-रोमक-वासिष्ठ-सौर-पैतामहास्तु पंचसिद्धान्तः । इन पांचों में से प्रथम दो का (पौलिश और रोमक का) लाटदेव ने विवेचन किया । वराहमिहिर की दृष्टि से पौलिश सिद्धान्त में गणना यथार्थ है, रोमक-सिद्धान्त भी लगभग ऐसा ही है । इन दोनों से भी अधिक स्पष्ट सावित्र-सिद्धान्त अर्थात् सौर सिद्धान्त या सूर्य-सिद्धान्त है । शेष दो वासिष्ठ और पैतामह झूठे (दुरविभ्रष्ट) हैं। पंचसिद्धान्तिका का एक संस्करण प्रोफेसर थीबोट (G. Thibaut) और महामहोपाध्याय सुधाकर द्विवेदी ने अंग्रेजी अनुवाद सहित प्रकाशित किया । सुधाकर जी के संस्कृत भाष्य का नाम “पंचसिद्धान्तिका प्रकाशिका" है (प्रयाग, १५ दिसम्बर' १८८८) । इसकी परम्परा में ही विज्ञान परिषद, प्रयाग, के पुराने पार्षद श्री महावीर प्रसाद श्रीवास्तव ने सूर्यसिद्धान्त के विज्ञान-भाष्य का दुस्तर कार्य हाथ में लिया । उनके जीवन भर का यह गुरुतर कार्य १९४० ई० में समाप्त हुआ । १९२२ में ग्रन्थ आरंभ हुआ, इसका प्रथम अध्याय (मध्यमाधिकार) १९२४ में प्रकाशित हुआ । बारहवां अध्याय १९३१ में छपा । धनाभाव से फिर काम रुक गया । अन्तिम दो अध्याय १९४० में छपे । इस प्रकार यह भाष्य भ्रातृ द्वितीया संवत् १९९७ वि० अर्थात् सन् १९४० ई० को समाप्त हुआ था । श्रीवास्तव जी का यह ग्रन्थ थोड़ा- थोड़ा करके विज्ञान-मासिक पत्रिका में लगभग प्रतिमास निकलता था, और ग्रन्थ रूप में इसकी कुछ प्रतियाँ अलग से भी तैयार कर दी गयीं । पिछले लगभग २० वर्ष से सूर्य-सिद्धान्त का यह विज्ञान भाष्य अनुपलब्ध रहा है । डा० रत्नकुमारी स्वाध्याय संस्थान को यह गौरव प्राप्त है, कि विज्ञान परिषद्, प्रयाग के अधिकारियों की असीम उदारता से इसके प्रकाशन की अनुमति इस संस्थान को प्राप्त हुई । प्राचीन वाङ्मय के अनमोल ग्रन्थों के प्रकाशन की आयोजना, स्वाध्याय संस्थान ने अपने हाथ में ली है। इस ग्रन्थ को हम दो खण्डों में प्रकाशित कर रहे हैं। ग्रन्थ के अन्तर्गत जो चित्र हैं, उनके ब्लाक विज्ञान-परिषद् ने .