भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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( १३ ) सिद्ध है कि हमारे ज्योतिषियों के बेध टालमी वा केपलर के बेधों की अपेक्षा अधिक शुद्ध हैं और इसलिए स्वतन्त्र भी हैं। इसी प्रकार यदि मन्दोच्चों, पातों तथा अन्य ध्रुवांकों की तुलना की जाय तो प्रगट हो जाता है कि हमारे आचार्यों के माने हुए ध्रुवांक अधिकांश में यथार्थ से अधिक निकट हैं। इसलिए यह सिद्ध हो जाता है कि हमारा ज्योतिष टालमी या किसी अन्य विदेशी ज्योतिष की छाया नहीं है वरन् स्वतन्त्र है। इन बातों का दिग्दर्शन विज्ञान-भाष्य में जगह-जगह कराया गया है। सूर्य-सिद्धान्त का रचना काल—इस सम्बन्ध में विद्वानों में बड़ा मतभेद है। इस पुस्तक में जो रचना काल बतलाया गया है वह तर्क से तो समझ में आता नहीं क्योंकि यदि यह इतने प्राचीनकाल, इक्कीस लाख पैंसठ हजार वर्ष से इसी प्रकार चला आता तो आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व महाभारत-काल में उस समय के महाराजाधिराज दुर्योधन के दरबार में जहाँ उस समय के बड़े-बड़े विद्वान मौजूद थे यह प्रश्न क्यों उठ खड़ा होता कि पाण्डवों के चौदह वर्ष का बनवास-काल कब पूरा होगा ? इस सम्बन्ध में भीष्म का जो उत्तर है उससे तो यह समझ में नहीं आता कि उस समय सूर्य-सिद्धान्त जैसे ग्रन्थ की ज्योतिष-गणना का उनको परिचय था। परन्तु इसमें संदेह नहीं कि इस ग्रन्थ का आदि रूप वराहमिहिर के बहुत पहले का है और संभव है कि पंचसिद्धान्तिका में जो रूप देख पड़ता है वह आदि रूप नहीं है वरन् उसमें वराहमिहिर ने कुछ संशोधन किया है। परन्तु आश्चर्य है कि आर्यभट्ट (४७६ ई०) ने अपने ग्रन्थ इसकी कहीं चर्चा नहीं की है, इससे यह अनुमान होता है कि आर्यभटीय के रचना काल के आसपास ही इसकी रचना भी हुई है। वराह- मिहिर ने सूर्य-सिद्धान्त का जो रूप दिया है वह वर्तमान सूर्य-सिद्धान्त से भिन्न है जिसमें अयन-चलन की बातें पीछे से बढ़ायी गयी हैं क्योंकि यदि अयन-चलन की चर्चा सूर्य-सिद्धान्त में वराहमिहिर के पहले होती तो यह पञ्चसिद्धान्तिका में कहीं न कहीं इसका समावेश जरूर करते और इतना ही लिखकर न संतोष करते कि प्राचीनकाल में अयन-बिन्दु आश्लेषा नक्षत्र में था अब पुनर्वसु में है। ब्रह्मगुप्त (६२८-६६५ ई०) के समय में भी सूर्य-सिद्धान्त का जो रूप था उसमें अयन-चलन की बात नहीं थी क्योंकि ऐसी दशा में ब्रह्मगुप्त इसकी चर्चा अवश्य करते। यह बात तो भास्कराचार्य के कुछ पहले मिलायी गयी होगी परन्तु फिर भी उस रूप में नहीं जैसा कि अब देख पड़ती है क्योंकि भास्कराचार्य ने स्वयं इसकी शुद्धता पर शंका प्रकट की है। इसलिये यह सिद्ध है कि वर्तमान सूर्य-सिद्धान्त का आदि-रूप तो वही है जो पश्च सिद्धान्तिका में दिया गया है और वराहमिहिर के पहले भी मौजूद था अथवा वाराही सूर्य-सिद्धान्त उसका संशोधित रूप है और बाद में भी उसमें ज्योतिषियों ने समय-समय पर संस्कार