सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरके इसको वर्तमान रूप में प्रकट किया है, जिसके लिये आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त आदि के ग्रन्थों या वेधों से सहायता ली गयी होगी, जैसा कि सेनगुप्त महोदय अपनी खण्डखाद्यक की भूमिका में सिद्ध करते हैं। पाश्चात्य विद्वानों का मत — इसके रचना काल के सम्बन्ध में पाश्चात्य विद्वानों ने बड़ा ऊहा-पोह किया है जिसके लिये उनको धन्यवाद देना हमारा परम कर्त्तव्य है। इस विषय में बेंटली महोदय ने बहुत परिश्रम किया है। इन्होंने सूर्य- चन्द्रमा आदि ग्रहों की गणना सूर्य-सिद्धान्त तथा नवीन वेधों के अनुसार भिन्न-भिन्न कालों के लिये करके उस समय को सूर्य-सिद्धान्त का रचनाकाल स्थिर किया है जब दोनों गणनाओं के अनुसार ग्रहों के भोगांश एक हो जाते हैं। यह बात पृष्ठ १४ के कोष्ठक से स्पष्ट होगी जिसमें ग्रहों की अशुद्धियां दिखलाई गयी हैं। इससे बेंटली यह परिणाम निकालते हैं कि सूर्य-सिद्धान्त ११वीं सदी के अन्तिम चरण में लिखा गया । देखने में तो यह बहुत ही युक्ति-युक्त जान पड़ता है और इसमें संदेह नहीं कि लेखक महोदय ने इसमें बड़ी नवीनता दिखलाई है परन्तु यथार्थ में यह रीति बिना अच्छी तरह परीक्षा किये मानने योग्य नहीं है। यह बात मैं बर्जेस के अनुवाद की प्रकाशन समिति के शब्दों में ही बतला देना पर्याप्त समझता हूं :— "दूसरे ग्रहों के सम्बन्ध में बेंटली ने शून्य अशुद्धि के जो समय निकाले हैं वे हमारे निकाले हुए समयों से बहुत मिलते हैं जिनको हमने १८६० ई० की अशुद्धियों से पीछे की तरफ गणना कर के निकाले हैं और जो ६७वें श्लोक की टीका के साथ दिये गये हैं।" "इन दोनों कोष्ठकों की तुलना करने पर यह तुरन्त देख पड़ेगा कि बेंटली ने अपना निर्णय ग्रहों के निरपेक्ष स्थानों की अशुद्धियों से नहीं निकाला है वरन् सूर्य के स्थान की तुलना में। परन्तु सूर्य के स्थान की अशुद्धि का उन्होंने विचार ही नहीं किया है। हिंदुओं का राशि-चक्र नाक्षत्रिक (Sidereal) है और सूर्य की गति पर किसी प्रकार निर्भर नहीं है। अन्य ग्रहों की तरह सूर्य भी ३१०२ ई० पूर्व उस स्थान पर नहीं था, जहाँ मान लिया गया है और इसलिये इस पद्धति के अनुसार सूर्य की जो गति मानी गयी है वह यथार्थ से भिन्न है क्योंकि नाक्षत्रवर्ष ३॥ मिनट बड़ा माना गया है। इसलिये सूर्य की अशुद्धि का विचार क्यों न किया जाय और ग्रहों की नाक्षत्रिक गति का विचार इसी अशुद्ध गति की तुलना में क्यों किया जाय ? यह प्रकट है कि बेंटली को सूर्य के स्थान का भी पूरी तरह विचार करना चाहिए था और यह दिखलाना चाहिए था कि इससे भी वही परिणाम निकलता है जैसा कि अन्य ग्रहों की गणना से और यदि नहीं तो असंगति का कारण क्या था ? ऐसा