भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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स्पष्टाधिकार १३३ यदि मन्दकेन्द्र या शीघ्र केन्द्र समपद में हो और विषम पद के अंत की मन्द या शीघ्र परिधि से समपद के अंत की मंद या शीघ्र परिधि कम हो तो उस लब्धि को समपदान्त परिधि में जोड़ दो तो इष्ट केन्द्र की स्फुट मंद या शीघ्र परिधि होगी । परन्तु यदि विषमपद के अंत की परिधि से अधिक हो तो उस लब्धि को सम पदान्त परिधि में घटा देने से स्फुट परिधि निकल आवेगी । विज्ञान-भाष्य- सूर्य सिद्धान्त का मत है कि मन्द परिधि या शीघ्र परिधि का मान मन्दकेन्द्र या शीघ्रकेन्द्र की भुज ज्या के अनुसार बदलता रहता है । किस जगह इसका परिमाण क्या है यह त्रैराशिक से निकालना चाहिए क्योंकि यह दिया हुआ कि सम और विषम पदों के अंत में इसके मान क्या हैं । बीच के किसी स्थान के मान को जानने के लिए यह तर्क करना चाहिए कि जब त्रिज्या (भुज ज्या का परम मान) के अंतर पर परिधियों का अंतर दिया हुआ है तो इष्ट केन्द्र की भुज ज्या के अंतर पर कितना होगा । इस नियम को संक्षेप में यों लिख सकते हैं— स्फुट मंद परिधि =मंद परिधि±विषम और सम पदों के अंत की परिधियों- का अंतर X इष्ट केन्द्र की भुज ज्या / त्रिज्या जैसे सूर्य की समपदान्त मन्द परिधि ८४०', विषम और समपदान्तों के मंद परिधियों का अन्तर २०' है, इसलिए यदि अभीष्ट मन्द केन्द्र 'अ' हो तो स्फुट मन्द परिधि होगी ८४०' - २०' X अ की भुज ज्या / ३४३८' क्योंकि समपदान्त मन्द परिधि अधिक है । इसी तरह अन्य ग्रहों की स्फुट मन्द परिधि तथा शीघ्र परिधि निकालनी चाहिए । तद्गुणे भुजकोटिज्ये भगणांश विभाजिते । तद्भुजज्याफलधनुः मान्दं लिप्तादिकं फलम् ॥३६॥ अनुवाद-(३६) स्फुट मन्द परिधि को क्रम से भुज ज्या और कोटि ज्या से गुणा करके ३६० से (यदि स्फुट मन्द परिधि अंशों में हो) या २१६०० से (यदि स्फुट मन्द परिधि कलाओं में हो) भाग दे दो । लब्धि क्रम से भुजफल और कोटिफल (कलाओं में) होंगी । भुजफल जिस धनु (कोण) की ज्या होगी उसे ही मन्द फल कहते हैं । विज्ञान भाष्य- इस नियम को संक्षेप में यों लिख सकते हैं :—