भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 838 में से

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स्पष्टाधिकार १५१

शीघ्रफल = $\frac{३४३८\times६७३}{३६४०}$ कला [ श्लोक ४१ का उत्तरार्द्ध, ४२ का पूर्वार्द्ध ]

= ६३६ कला

यह पहला शीघ्रफल हुआ । यह धनात्मक है, क्योंकि शीघ्र केन्द्र पहले पद में

हैं । यदि सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार आगे की क्रियाएं करनी हों तो ४४वें श्लोक के

अनुवाद में जो कुछ लिखा गया है उसके अनुसार करना चाहिये । परन्तु यह बहुत

लम्बी रीति है इसलिए इस श्लोक के विज्ञान भाष्य के अंत में जो संक्षिप्त नियम

लिखे गये हैं उन्हीं के अनुसार क्रिया करता हूँ :-

नियम (१) के अनुसार + ६३६' का आधा, चिह्न उलटने से - ३१८' अर्थात्

  • ५° १८' हुआ । इसको गुरु के मंद केन्द्र ११$^व$ १° ३०' में बीजगणित के अनुसार

जोड़ा तो आया १०$^व$ २६° १२' । यही प्रथम संस्कृत मंद केन्द्र हुआ । इसका मन्द

फल प्रथम संस्कृत मंद फल हुआ ।

१०$^व$ २६° १२' नव राशि से अधिक है इसलिए चौथे पद में है, जिसका

१$^व$ २६° १२' अर्थात् ५६° १२' गत और ३३° ४८' गम्य है ।

३३° ४८' = ३३ $\times$ ६० + ४८ कला

= २०२८ कला

= ९ पिंड + ३'

९ वें पिंड की ज्या = १६१०'

१० वें " " = १७६३'

$\therefore$ दोनों ज्याओं का अंतर = १५३'

२२५ ; ३' : : १५३' : अभीष्ट अंतर

$\therefore$ अभीष्ट अंतर = $\frac{३\times१५३}{२२५}$ = २'

$\therefore$ मंद भुजज्या = १६१०' + २' = १६१२'

वृहस्पति की मन्द परिधियों का अंतर १° है इसलिये ३८ वें श्लोक के

अनुसार,

मन्द स्फुट परिधि = ३३° - $\frac{१^\circ\times१६१२}{३४३८}$

= ३३° - २८'

= १९५२'

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