भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 278, कुल 838 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 278

त्रिप्रश्नाधिकार २५५ इसलिए प्रकट है कि १६८२+२६६=२२४८ विक्रमीय के दो चार वर्ष उपरांत ही यह सिद्ध हो जायगा कि वसंत संपात का पूर्ण भगण होता है अथवा आंदोलन । यदि यह बात प्रत्यक्ष हो गयी कि वसंत सम्पात विन्दु पूर्ण भगण के कारण पीछे खसकता ही जायगा तो भारतीय पंचांग-निर्माण की रीति तथा तिथियों और पर्वों के निश्चय करने के लिए संशोधन की अत्यन्त आवश्यकता पड़ेगी । फलित ज्योतिष के लिए योगों और मुहूर्तों के निश्चय करने के जितने नियम हैं उनमें भी महान् परिवर्तन करना होगा । पलभा जानने की १ली रीति एवं विषुवति छाया स्वदेशे या दिनार्धजा । दक्षिणोत्तरयोरेव सा तत्र विषुवत्प्रभा ॥१२॥ अनुवाद--(१२) इस प्रकार सूर्य जिस दिन विषुवद् वृत्त पर हो उस दिन मध्याह्न काल में जिस स्थान की उत्तर दक्षिण रेखा पर १२ अंगुल शंकु की जितनी लम्बी छाया पड़े वही उस स्थान की विषुवत्प्रभा या पलभा होती है । विज्ञान भाष्य—पलभा के सम्बन्ध में २०४-२०५ पृष्ठों पर तथा इसी अध्याय के सातवें श्लोक के भाष्य में बहुत कुछ लिखा जा चुका है । २०५वें पृष्ठ में यह बतलाया गया है कि किसी स्थान के अक्षांश की स्पर्शरेखा उस स्थान की पलभा को शंकु से भाग देने पर आती है । इसलिए यहाँ यह बतला देना आवश्यक है कि इस श्लोक के अनुसार पलभा का जो मान जाना जाता है वह स्थूल है । क्योंकि सायन मेष या सायन तुला संक्रान्ति (विषुव संक्रान्ति) के दिन, जिस दिन मध्याह्न काल में शंकु की छाया नाप कर पलभा जानी जाती है मध्याह्न काल में सूर्य ठीक विषुवद् वृत्त पर नहीं होता वरन् कुछ आगे या पीछे होता है । मध्याह्न काल में ठीक विषुवद् वृत्त पर सूर्य के आने का संयोग कई वर्ष के बाद आता है । इस दिन सूर्य की क्रान्ति प्रत्येक घंटे में प्रायः एक कला के हिसाब से बदलती है । इसलिए सायन मेष या तुला संक्रान्ति शुद्ध काल गणना से जानकर सूर्य की मध्याह्न काल की क्रान्ति जान लेनी चाहिये और इसका संस्कार कर लेने के बाद शुद्ध पलभा जाननी चाहिये । संस्कार करने की रीति अगले १४-१५ श्लोकों में बतलायी जायगी । अक्षांश जानने की १ली रीति शंकुश्छायाहते त्रिज्ये विषुवत्कर्णभाजिते । लम्बाक्षज्ये तयोश्चापे लम्बाक्षौ दक्षिणौ सदा ॥१३॥

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक) · पृष्ठ 278, कुल 838 में से · BharatKosha