सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 280, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिप्रश्नाधिकार २५७ ४२-४३ चित्रों के सम्बन्ध में भी बतलाया गया है कि क्षितिज के उत्तर- बिन्दु से ध्रुव की ऊँचाई अक्षांश के समान होती है। इससे पाठकों को शायद शंका हो कि अक्षांश की कौन परिभाषा ठीक है। इसलिए यहां इस बात का निश्चय कर देना चाहिये कि अक्षांश की यह तीनों परिभाषाएँ एक ही हैं। चित्र ७ और १० से स्पष्ट है कि विषुवत् रेखा से किसी स्थान का जो कोणात्मक अंतर उत्तर-दक्खिन रेखा पर होता है वही उस स्थान का अक्षांश है और ध्रुव से उत्तर-दक्खिन रेखा पर स्थान का कोणात्मक अंतर उसका लम्बांश है। विषुवत् रेखा के तल को यदि आकाश की ओर बढ़ा दिया जाय तो यही विषुवन्मण्डल कहलाता है और उत्तर-दक्खिन रेखा के तल को आकाश में बढ़ा दिया जाय तो वह यामोत्तर वृत्त कहलाता है। इसी तरह पृथ्वी के केन्द्र से किसी स्थान को मिलाने वाली रेखा (चित्र ७ की रेखा स भ) ऊपर बढ़ाने पर आकाश के जिस बिन्दु पर पहुँचती है वह उस स्थान का खस्वस्तिक कहलाता है। इसलिए यह सिद्ध है कि किसी स्थान के खस्वस्तिक से विषुवन्मण्डल का जो अंतर यामोत्तर वृत्त पर होता है वह भी अक्षांश है तथा खस्वस्ति से आकाशीय ध्रुव का जो अन्तर यामोत्तरवृत्त पर होता है वह लम्बांश है। इसलिए चित्र ४२, ४३ के ख वि धनु श स्थान के अक्षांश तथा ख ध धनु श स्थान के लम्बांश हुए। परन्तु ध वि धनु या उ ख धनु ६० अंश के समान है। इसलिए प्रत्येक से सामान्य धनु ध ख निकाल दिया जाय तो शेष ख वि और उ ध समान होंगे, अर्थात् खस्वस्तिक से विषुवन्मण्डल का जो अंतर होता है वही क्षितिज के उत्तर बिन्दु से उत्तरी आकाशीय ध्रुव का अन्तर होता है। इसी तरह यह भी सिद्ध हो सकता है कि ध ख धनु द वि धनु के समान है, अर्थात् क्षितिज के दक्षिण बिन्दु से विषुवन्मण्डल की जो ऊंचाई होती है वह भी लम्बांश के समान है। यह भी स्पष्ट है कि उत्तर गोल में किसी स्थान के खस्वस्तिक से विषुवन्मण्डल सदैव दक्षिण रहता है इसलिए ख वि अक्षांश और वि द लम्बांश उत्तर गोल में सदा दक्षिण ही रहेंगे। अब यह सिद्ध करना रह गया कि शंकु और विषुवतकर्ण के बीच का अन्तर अक्षांश के समान क्यों है। यह ध्यान रखना चाहिए कि चित्र ५५ में पृथ्वी की तुलना में शंकु बहुत बड़ा दिखलाया गया है। रेखागणित से यह स्पष्ट है कि < स श छ = < र श ख = < श र भ + < र भ श